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Aadikaleen Aur Madhyakaleen kaviyon Ka Aalochanatmak Paath

Aadikaleen Aur Madhyakaleen kaviyon Ka Aalochanatmak Paath

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  • Pages: 304
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183618489
  •  
    भारतीय जनमानस में अगर धर्म के बाद किसी भावना को बहुत साफ़ ढंग से देखा जा सकता है, तो वह कविता-प्रेम है | यही कारण है कि भारत में साहित्य की अन्य विधाओं के सापेक्ष कविता की परंपरा न सिर्फ बहुत लम्बी, गहरी और व्यापक रही है, बल्कि उसने भारतीय समाज के विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक युगों को वाणी भी दी है | यही नहीं उसने एक सामाजिक शक्ति के रूप में अपनी निर्णायक भूमिका भी निभाई है | इस पुस्तक में हिंदी कविता के दो आरंभिक और महत्त्वपूर्ण युगों का विवेचन किया गया है, एक आदिकाल और दूसरा मध्यकाल | अब तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर कहा जा सकता है कि हिंदी कविता का उद्भव सातवीं-आठवीं शताब्दी के आसपास हुआ जिसकी पृष्ठभूमि में पालि, प्राकृत और अपभ्रंश का बड़ा योगदान है | आदिकालीन काव्य में अपभ्रंश का बहुत रचनात्मक इस्तेमाल मिलता है | इस दौर की कविता की मूल संवेदना भक्ति, प्रेम, शौर्य, वैराग्य और नीति आदि से मिल-जुलकर बनी है | आदिकालीन काव्य के बाद भक्तियुग में कबीर, सूर, तुलसी तथा जायसी जैसे महँ कवियों की अगुआई में काव्य रचा गया | संवेदना और शील की दृष्टि से इस युग में भी कई काव्य-धाराएँ मौजूद थीं | संत कवियों की वाणी की व्याप्ति दूर-दूर तक थी | ये लोग अक्सर भ्रमणरत रहते थे इसलिए इनकी भाषा में बहुत विविधता मिलती है | इस पुस्तक में इन दोनों युगों की कविता की विस्तार से, तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में, विवेचना की गई है | दोनों युगों के महत्त्वपूर्ण कवियों की रचनाओं, उनके जीवन-वृत्त और उनके युग की विशेषताओं की जानकारी से समृद्ध इस पुस्तक से छात्रों को निश्चय ही अत्यंत लाभ होगा | हिंदी साहित्य के विद्वान और महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती ने अपने अध्यापन-अनुभव को समेटते हुए इस पुस्तक को छात्रों के लिए उपादेय बनाने में कोई कसार नहीं छोड़ी है |

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