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Aalochkatha

Aalochkatha

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  • Pages: 182p
  • Year: 2004, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 10: 8180310187
  •  
    हिन्दी में आत्म-वृत्त कम हैं । इधर तो कहना चाहिए, उनका चलन कम ही हुआ है । सामाजिक शिष्टाचार और दबावों के कारण गोपन और संकोच की बढ़ती मनोवृत्ति शायद इसका कारण हो । ऐसे में ' आलोचकथा' का अपेक्षया नया विधान पाठकों का ध्यान सहज ही आकर्षित करेगा । यों तो क्या कहना है-क्या नहीं कहना है, इसकी चिंता लेखक-मात्र को होती है, पर आत्मकथा में यह समस्या कुछ और प्रबल हो उठती है । इस सामान्य लेखकीय समस्या का मूल स्रोत वस्तुत: भाषा की अपनी प्रकृति में ही अंतर्निहित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कहती भी है और छिपाती भी है, प्रकट भी करती है, छलती भी है । तब भाषा में ही सक्रिय रहने वाले रचनाकार को यह कला सहज ही आ भी जानी चाहिए । 'आलोचकथा' को तो इसका प्रमाण और दे सकना चाहिए क्योंकि इसके लेखक का मुख्य कार्य- क्षेत्र भाषा और संवेदना की अंतर-क्रिया के प्रदेशों में रहा है । यों, 'आलोचकथा' अकाल्पनिक गद्य को संपूर्ण रूप में बरतती है, जहाँ आत्मकथा-संस्मरण- रेखाचित्र-जर्नल- आलोचना के विविध रूप एक-दूसरे में घुल-मिल गये हैं । तब रचना के इन दोनों स्तरों पर 'आलोचकथा' का वैशिष्ट्य पाठक प्रीतिकर रूप में अनुभव कर सकेगा ।

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    Ramswarup Chaturvedi

    रामस्वरूप चतुर्वेदी

    जन्म: 1931 ई. में कानपुर में। आरंभिक शिक्षा पैतृक गाँव कछपुरा (आगरा) में हुई। बी.ए. क्राइस्ट चर्च, कानपुर से। एम.ए. की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1952 में। वहीं हिंदी विभाग में अध्यापन (1954-1991)। डी.फ़िल् की उपाधि 1958 में मिली, डी.लिट् की 1972 में।

    आरंभिक समीक्षापरक निबंध 1950 में प्रकाशित हुए। नयी प्रवृत्तियों से संबद्ध पत्रिकाओं का संपादन किया: ‘नये पत्ते’ (1952), ‘नयी कविता’ (1954), ‘क ख ग’ (1963)। शोध-त्रैमासिक ‘हिंदी अनुशीलन’ का संपादन (1960-1984)।

    प्रकाशन: शरत् के नारी पात्र (1955), हिंदी साहित्य कोश (सहयोग में संपादित - प्रथक भाग 1958, द्वितीय भाग 1963), हिंदी नवलेखन (1960), आगरा जिले की बोली (1961), भाषा और संवेदना (1964), अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या (1968), हिंदी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियाँ (1969), कामायनी का पुनर्मूल्यांकन (1970), मध्यकालीन हिंदी काव्यभाषा (1974), नयी कविताएँ: एक साक्ष्य (1976), कविता यात्रा (1976), गद्य की सत्ता (1977), सर्जन और भाषिक संरचना (1980), इतिहास और आलोचक-: ष्टि (1982), हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986), काव्यभाषा पर तीन निबंध (1989), प्रसाद-निराला-अज्ञेय (1989), साहित्य के नये दायित्व (1991), कविता का पक्ष (1994), समकालीन हिंदी साहित्य: विविध परि: श्य (1995), हिंदी गद्य: विन्यास और विकास (1996), तारसप्तक से गद्यकविता (1997), भारत और पश्चिम: संस्कृति के अस्थिर संदर्भ (1999), आचार्य रामचंद्र शुक्ल - आलोचना का अर्थ: अर्थ की आलोचना (2001), भक्ति काव्य-यात्रा (2003)।

    संयुक्त संस्करण: भाषा-संवेदना और सर्जन (1996), आधुनिक कविता-यात्रा (1998)।

    आलोचना: सैद्धांतिक और व्यावहारिक, भाषाशास्त्र तथा विचारों के साहित्य में विशेष रुचि।

    सुषमा के साथ विवाह: 1955। तीन बेटे - विनीत (=पल्लवी), विनय (=दीपा), विवेक (=शेफाली)।

    साधना तथा व्यास सम्मान: 1996

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