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Adyatan Bhasha Vigyan : Pratham Pramanik Vimarsh

Adyatan Bhasha Vigyan : Pratham Pramanik Vimarsh

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Special Price Rs. 360

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  • Pages: 264p
  • Year: 2012
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180316982
  •  
    भाषाविज्ञान पर अब तक लिखित सभी पुस्तकों से अलग एवं विशिष्ट! इसके विकास के शीर्ष,.? - प्रगामी चरण-अद्यतन भाषाविज्ञान-को व्यापकता-गहनता में विवेचित करने वाली तथा संक्षेप में भाषाविज्ञान के विकास-क्रम को निरूपित करने वाली प्रथम प्रामाणिक पुस्तक! यह पुस्तक एक ओर सामान्य भाषाविज्ञान से वर्णनात्मक, संरचनात्मक भाषाविज्ञान तक, मनोभाषाविज्ञान से तंत्रिका- भाषाविज्ञान तक, व्यवहारवादी भाषाविज्ञान से विकासात्मक भाषाविज्ञान तक, समाज- भाषाविज्ञान से संभाव्यतापरक भाषाविज्ञान तक, विवेचनात्मक भाषाविज्ञान से पाठात्मक भाषाविज्ञान तक, डेकार्टवादी भाषाविज्ञान से संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान तक, अदालती भाषाविज्ञान से गाणितिक और बीज-गाणितिक भाषाविज्ञान तक, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से अनुप्रयुक्तत भाषाविज्ञान तक, संगणक भाषा विज्ञान से कॉपर्स भाषाविज्ञान तक बीस प्रकार के भाषाविज्ञान के निरूपण और युक्तियुक्त विवेचन को अपने में समाविष्ट करती हे; तो: दूसरी ओर इसे नृतत्वविज्ञान, प्राणिविज्ञान, चिकित्साविज्ञान, पर्यावरणविशन, प्रजाति विज्ञान, शान्ति-अध्ययन, आनुपातिक अध्ययन, सांख्यिकी, धर्म, शिक्षा और दर्शन से जोड़कर स्वरूपित करती है । यह पुस्तक डी. 'शीतांशु' के भाषाविज्ञान- विषयक वर्षो के गहन अध्ययन-मनन और अध्यापन का सुपरिणाम है । निश्चय ही यह पुस्तक हिन्दी में भाषावैज्ञानिक चिन्तन और लेखन के एक बड़े अभाव की पूर्ति करती हैं तथा हिन्दी संसार को अद्यतन भाषाविज्ञान से परिचित कराने का श्रेय प्राप्‍त करती है । अद्यतन भाषाविज्ञान के विभित्र प्रकारों का ज्ञान प्राप्त करने के. लिए हिन्दी में अकेली पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक!

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    Pandey Shashibhushan Shitanshu

    पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'
    जन्म : 13 मई 1941
    शिक्षा : पी-एच. डी. (हिन्दी), डी. लिट् (भाषा- विज्ञान), स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) ।
    व्यक्तित्व : सैद्धान्तिक और सर्जनात्मक आलोचक । साहित्य-सिद्धान्त, साहित्य-विश्लेषण और प्रत्यालोचन के लिए सिद्ध-प्रसिद्ध । व्यापक, गहन अध्ययन एवं मौलिक संदृष्टि से सम्पन्न भाषाविज्ञानी । प्रखर, तार्किक वक्ता एवं लेखक ।
    वृत्ति : अध्यापन 1961 - 77 भागलपुर विश्वविद्यालय सेवा में व्याख्याता । 1977- 85 गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय (अमृतसर) में हिन्दी के वरिष्ठ रीडर । 1985 पूना विश्वविद्यालय (पुणे) में हिन्दी भाषा के प्रोफेसर । कुछ ही समय बाद 1985 में गुनाके, विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर । 1986-  1989 वहीं हिन्दी विभाग में प्रोफेसर-अध्यक्ष ।  1992 - 1994 वहीं भाषा-संकाय के अधिष्ठाता ।  1992, 95 भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भारत सरकार (नयी दिल्ली) द्वारा क्रमश: त्रिनिदाद और पेइचिंग के लिए विजिटिंग प्रोफेसर पद पर चयनित । फरवरी 200 -जनवरी 2007 महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) में विजिटिंग प्रोफेसर । सम्पादन : 01 फरवरी 2007-30 अप्रैल  2008 वहीं वरिष्ठ अतिथि सम्पादक के बतौर तुलनात्मक साहित्य विश्वकोश (1350 पृष्ट) तैयार किया । जुलाई 2008 में विश्वकोश प्रकाशित ।
    उच्चतर शोध एवं शोध-निर्देशन : यूजीसी. (नई दिल्ली) द्वारा संभरित दो बृहत् शोध-परियोजनाएँ ससम्पन्न-1गुरुमुखी लिपि में उपलब्ध हिन्दी साहित्य : समाज-सांस्कृतिक अध्ययन, 2. रामचरितमानस : संकेत- विसंरचनात्मक शैलीवैज्ञानिक सन्दर्भ । अब तक 48 पी-एच. डी. एवं 57 एम.फिल. शोधार्थियों को अपने ससफल निर्देशनमें उउपाधि दिलायी।
    अवकाश-ग्रहण : 30 जून, 2001
    लेखन : अब तक प्रकाशित 300 से अधिक शोधपत्र एवं  26 पुस्तकें ।

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