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Antim Aakanksha

Antim Aakanksha

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  • Pages: 111p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312083
  •  
    किसी के स्वस्थ व्यवहार और उपकार के प्रति कृतज्ञता-समर्पण की सीमा तक पहुँची हुई ऐसी कृतज्ञता कि बचपन से चाकरी में रहने वाला नौकर अपने उसी हम उम्र स्वमि-पुत्र के परिवार में अगले जन्म में भी जन्म लेने और उस परिवार की चाकरी करने की अंतिम आकांक्षा अन्तिम सांस लेते समय प्रकट कर रहा हो-यही है वह अंतरधारा जो इस उपन्यास में अनादि से अंत तक प्रवाहित हो रही है । नौकर रमला को सेवा के पहले ही दिन पूरे नाम रामलाल से पुकारने का जो भाव उसका खास-पुत्र प्रकट करता है वह भाव धीरे-धीरे अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ता जाता है और रामलाल की अन्तिम आकांक्षा का कारण बन जाता है । उपन्यासकार सियारामशरण गुप्त अपने उपन्यासों में किसी न किसी ऐसी ही उत्कृष्ट भावना अथवा मान्यता को आधार बना: कर अपने उपन्यास की रचना करने के कायल थे, जिसे उन्होंने इस उपन्यास की भी अन्तरधारा के रूप में अपने कथानक में प्रवाहित किया है, जिससे उपन्यास रोचक और मनोरंजक बनने के साथ ही पाठक के अंतर्मन को भी प्रभावित करने वाला बन गया है ।

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    Siyaramsharan Gupt


    श्री सियारामशरण गुप्त
    जन्म : 1895, चिरगाँव, झांसी, उत्तर प्रदेश देहावसान : 29 मार्च, 1963
    श्री सियारामशरण गुप्त राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे । कवि, कथाकार और निबन्ध लेखक के रूप में उन्होंने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था । उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: -
    काव्य : मौर्य-विजय, अनाथ, दूर्वाद्रल, विषाद, आर्द्रा, आत्मोत्सर्ग, पाथेय, मृणमयी, बापू उलूक, दैनिकी, नकुल, नोआखली में, जयहिन्द, गीता-संवाद, गोपिका, अमृत-पुत्र । उपन्यास-गोद, अंतिम आकांक्षा, नारी ।
    कहानीसंग्रह - मानुषी ।
    निबन्ध संग्रह - झूठ-सच ।
    नाटक - पुण्य पर्व ।
    श्री सियारामशरण गुप्त की रचनाओं में उनके व्यक्तित्व की सरलता, विनयशीलता, सात्विकता और करुणा सर्वत्र प्रतिफलित हुई है । वास्तव में गुप्त जी मानवीय संस्कृति के साहित्यकार हैं । उनकी रचनाएं सर्वत्र एक प्रकार के चिन्तन, आस्था-विश्वासों से भरी हैं, जो उनकी अपनी साधना और गांधी जी के साध्य साधन की पवित्रता की गूंज से ओत-प्रोत हैं ।

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