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Apne Jaisa Jeevan

Apne Jaisa Jeevan

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  • Pages: 102p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171196319
  •  
    अपने जैसा जीवन एक नयी तरह की कविता के जन्म की सूचना देता है । यह ऐसी कविता है जो मनुष्य के बाहरी और आंतरिक संसार की अज्ञात–अपरिचित मनोभूमियों तक पहुँचने का जोखिम उठाती है और अनुभव के ऐसे ब्योरे या संवेदना के ऐसे बिंब देख लेती है जिन्हें इससे पहले शायद बहुत कम पहचाना गया है । सविता सिंह ऐसे अनुभवों का पीछा करती हैं जो कम प्रत्यक्ष हैं, अनेक बार अदृश्य रहते हैं, कभी–कभी सिफर्’ अपना अँधेरा फेंकते हैं और ‘न कुछ’ जैसे लगते हैं । इस ‘न कुछ’ में से ‘बहुत कुछ’ रचती इस कविता के पीछे एक बौद्धिक तैयारी है लेकिन वह स्वत%स्फूर्त्त ढंग से व्यक्त होती है और पिकासो की एक प्रसिद्ध उक्ति की याद दिलाती है कि कला ‘खोजने’ से ज़्यादा ‘पाने’ पर निर्भर है । प्रकृति के विलक्षण कार्यकलाप की तरह अनस्तित्व में अस्तित्व को संभव करने का एक सहज यत्न इन कविताओं का आधार है । ऐसी कविता शायद एक स्त्री ही लिख सकती है । लेकिन सविता की कविताओं में प्रचलित ‘नारीवाद’ से अधिक प्रगतिशील अर्थों का वह ‘नारीत्व’ है जो दासता का घोर विरोधी है और स्त्री की मुक्ति का और भी गहरा पक्षधर है । इस संग्रह की अनेक कविताएँ स्त्री के ‘स्वायत्त’ और ‘पूर्णतया अपने’ संसार की मूल्य–चेतना को इस विश्वास के साथ अभिव्यक्त करती हैं कि मुक्ति की पहचान का कोई अंत नहीं है । यह सिफर्’ संयोग नहीं है कि सविता की ज़्यादातर कविताएँ स्त्रियों पर ही हैं और वे स्त्रियाँ जब देशी–विदेशी चरित्रों और नामों के रूप में आती हैं तब अपने दुख या विडंबना के ज“रिये अपनी मुक्ति की कोशिश को मूर्त्त कर रही होती हैं । उनका रुदन भी एकांतिक आत्मालाप की तरह शुरू होता हुआ सार्वजनिक वक्तव्य की शक्ल ले लेता है । सविता सिंह लगातार स्मृति को कल्पना में और कल्पना को स्मृति में बदलती चलती हैं । यह आवाजाही उनके काव्य– विवेक की भी रचना करती है, जहाँ यथार्थ की पहचान और बौद्धिक समझ कविता को वायवीय और एकालापी होने से बचाती है । मानवीय संवेगों को बौद्धिक तर्क के संसार में पहचानने का यह उपक्रम सविता की रचनात्मकता का अपना विशिष्ट गुण है । इस आश्चर्यलोक में कविता बार–बार अपने में से प्रकट होती है, अपने भीतर से ही अपने को उपजाती रहती है और अपने को नया करती चलती है ।

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    Savita Singh

    जन्म: फरवरी 1962 आरा (बिहार)।

    शिक्षा: राजनीतिशास्त्र में एम.ए., एम.फिल., पी-एच.डी. (दिल्ली विश्वविद्यालय)। मांट्रियाल (कनाडा) स्थित मैक्गिल विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्ष तक शोध व अध्यापन। शोध का विषय: ‘भारत में आधुनिकता का विमर्श’।

    सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अध्यापन का आरम्भ करके डेढ़ दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। सम्प्रति इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर, स्कूल ऑव जे़न्डर एंड डेवलेपमेंट स्टडीज़ की संस्थापक निदेशक रहीं।

    हिन्दी व अंग्रेज़ी में सामाजिक-राजनीतिक परि: श्य, स्त्री-विमर्श और अन्य वैचारिक मुद्दों पर निरन्तर लेखन। अनेक शोध पत्र और कविताएँ अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पहला कविता संग्रह ‘अपने जैसा जीवन’ (2001) हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत। दूसरे कविता संग्रह ‘नींद थी और रात थी’ (2005) पर रज़ा सम्मान। दो द्विभाषिक काव्य संग्रह ‘रोविंग टुगेदर’ (अंग्रेज़ी-हिन्दी) तथा ‘ज़ स्वी ला मेजों दे जेत्वाल (फ्रेंच-हिन्दी) 2008 में प्रकाशित। अंग्रेज़ी में कवयित्रियों के अन्तर्राष्ट्रीय चयन ‘सेवेन लीव्स, वन ऑटम’ (2011) का सम्पादन जिसमें प्रतिनिधि कविताएँ शामिल। 2012 में प्रतिनिधि कविताओं का चयन ‘पचास कविताएँ: नयी सदी के लिए चयन’ शृंखला में प्रकाशित। फाउंडेशन ऑव सार्क राइटर्स ऐंड लिटरेचर के मुखपत्र ‘बियांड बोर्डर्स’ का अतिथि सम्पादन।

    कनाडा में रिहाइश के बाद दो वर्ष का ब्रिटेन प्रवास। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलैंड और मध्यपूर्व तथा अफ्रीका के देशों की यात्राएँ जिस दौरान विशेष व्याख्यान दिये।

    सम्पर्क: 28/604, ईस्टएंड अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, फेज-1 एक्सटेंशन, दिल्ली-110096

    मो.: 0919911401974

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