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Bihari Ka Naya Mulyankan

Bihari Ka Naya Mulyankan

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Special Price Rs. 180

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  • Pages: 183p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318351
  •  
    प्रस्तुत पुस्तक में बिहारी सतसई का मूल्यांकन करते समय तत्कालीन सामंतीय परिवेश को बराबर दृष्टि में रखा गया है ! 'बिहारी' दरबार में रहते थे, पर उनको दरबारी नहीं कहा जा सकता ! उनमें चाटु की प्रवृत्ति नहीं थी, वे वेश-भूषा, रहन-सहन, आन-बाण आदि में किसी सामंत-सरदार से कम न थे, उनका दृष्टिकोण पूर्णतः सामंतीय था, जो सतसई के काव्य तथा शैलीगत सतर्कता और सज्जा में अभिव्यक्त हो उठा है ! उनके प्रेम, नारी-सम्बन्धी भाव, गाँव-सम्बन्धी विहार सभी पर सामंत-कवि की छाप है, दरबारी कवि की नहीं ! इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करने पर ही सतसई का सम्यक आकलन किया जा सकता था ! इसके लिए भी सतसई को ही साक्ष्य माना गया है ! इससे सुविधा भी हुई ! तत्कालीन परिस्थिति और राजनितिक स्तिथि के नाम पर कहीं से इतिहास के दस-बीस पृष्ठ फाड़कर चिपकाने नहीं पड़े ! 'नयी-समीक्षा' का आग्रह भी कुछ ऐसा ही है !

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    Bachchan Singh

    'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ के रूप में हिंदी को एक अनूठा आलोचना-ग्रंथ देनेवाले बच्चन सिंह का जन्म जिला जौनपुर के मदवार गांव में हुआ था।

    शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में हुई।

    आलोचना के क्षेत्र में आपका योगदान इन पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है : क्रांतिकारी कवि निराला, नया साहित्य, आलोचना की चुनौती, हिंदी नाटक, रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, बिहारी का नया मूल्यांकन, आलोचक और आलोचना, आधुनिक हिंदी आलोचना के बीज शब्द, साहित्य का समाजशास्त्र और रूपवाद, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन तथा हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास (समीक्षा)।

    कथाकार के रूप में आपने लहरें और कगार, सूतो व सूतपुत्रो वा (उपन्यास) तथा कई चेहरों के बाद (कहानी-संग्रह) की रचना की। प्रचारिणी पत्रिका के लगभग एक दशक तक संपादक रहे।

    निधन : 5 अप्रैल, 2008

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