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Chautha Shabda

Chautha Shabda

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  • Pages: 170p
  • Year: 1993
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171783430
  •  
    उजली हँसी के छोर पर ( 1960) और अगली शताब्दी के बारे में ( 1981) संग्रहों के बाद परमानंद श्रीवास्तव की कविता ओं का तीसरा संग्रह चौथा .शब्द एक दशक से कुछ अधिक के अंतराल पर प्रकाशित हो रहा है । कविता के इतिहास में यह बीता हुआ दशक कविता के लिए ही कठिन समय बनकर उपस्थित नहीं हु आ, शब्द या अभिव्यक्ति के सभी रूपों और मा ध्यमों के लिए और सबसे अधिक मानवीय अस्तित्व के लिए, मनुष्य द्वारा अर्जित ममस्त मूल्य सम्पदा के लिए चुनौती बनकर उपस्थित हु आ । यह. दौर बीता नहीं है बल्कि आज और अधिक भयावह प्रश्नों और शंकाओं से घिरा है । परमानंद श्रीवास्तव ने कविता के बाहर भी शब्द के पक्ष में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में, मानवीय मूल्यों के प क्ष में लगातार संघर्ष किया है और कविता के भीतर भी धीमी शांत ऐन्द्रिकता, राग संवेदना और जीवन के प्रति सहज आसक्‍ति मात्र से संतुष्ट न होकर ऐसा उत्तेजक नाटकीय शिल्प विकसित किया है जो कविता के पाठको के रूप में अपने समाज के प्रति सी धा सम्बो धन परमानंद श्रीवास्तव के इस संग्रह में ' इन दिनो ', ' साध्वियों, ' बटोर ' जैसी कविताएँ अपने कठिनतम समय के मुख्य संकट को न किसी .शब्द - छल से छिपाती हैं, न खतरनाक ताकतों को सी धे लक्ष्य करने से बचती हैं । इसके बाद भी परमानंद श्रीवास्तव कविता के अपने विन्यास या रूप - तंत्र के प्रति कितने सजग हैं, इसका अनुमान सहज ही किया जा मकना है । ची था .शब्द में उनका अनुभव -संसार आई धक विस्तृत है और स्थितियों, चरित्रों तथा समय की त्रासदियों को देखने -समझने की दृष्टि भी अधिक विकसित और सचेत है । वह अघाया हु आ आदमी, ' फुर्सत में '. अपरिचित ', ' सहपाठी मिले एक दिन ' जैसी कविताएँ एक तरह के क थातंतु का आ श्रय लेती हैं जबकि ' स्त्री सबो, धनी ' जैसी कविता मानवीय अनुभव और भाषा के ' स्रोतों तक जाने के लिए एक विलक्षण लोकरंग प्राप्त करती है । स्त्री की यातना के अनु भव प्रत्यक्ष कई कविता ओं मे दर्ज हैं । यह कविता भी उसी अनु भव को अतीत की यातनापूर्ण यादों मे जोडकर देखने की सार्थक कोशिश है । परिप्रेक्ष्य - सम्पन्न कविता ओं के लिए यह सग्रह जरूर ही पाठकों के बीच देर तक चर्चा में रहेगा और शायद आनेवाली कविता का संकेत भी देगा ।

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    Parmanand Shrivastava

    जन्म: 10 फरवरी, 1935

    पहली कविता ‘नई धारा’ (1954) में और आलोचना के रूप में पहला निबन्ध (1957) ‘युगचेतना’ में प्रकाशित। दर्जन-भर कहानियाँ - कहानी, सारिका, धर्मयुग’ अणिमा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। आलोचक और कवि के रूप में खास अपनी पहचान। कई लघु पत्रिकाओं के संपादन में सहयोग। कई वर्षों तक आलोचना की प्रसिद्ध पत्रिका ‘आलोचना’ के संपादन से सम्बद्ध रहे। सम्प्रति ‘आलोचना’ के संपादक के रूप में सक्रिय। बहुत पहले ‘साखी’ अनियतकालीन पत्रिका का संपादन।

    उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘समकालीन कविता का यथार्थ’ के लिए रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार से समानित। आलोचना की दो अन्य पुस्तकें ‘कवि-कर्म और काव्य भाषा’ एवं ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ तथा कविता-संग्रह ‘अगली शताब्दी के बारे में’ उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत। केन्द्रीय साहित्य अकादेमी की साधारण सभा (1983-02) के सदस्य रहे। साहित्य अकादमी के लिए ‘समकालीन हिन्दी कविता’ और ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’ का संपादन। गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रेमचंद पीठ के प्रोफेसर के रूप में 1995 में अवकाश प्राप्त। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा एमेरिटस प्रोफेसर मनोनीत। एक वर्ष बर्दवान विश्वविद्यालय (प.बं.) में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर रहे। कलकत्ता विश्वविद्यालय की घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यानमाला में समकालीन कविता पर तीन व्याख्यान। भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता की हजारीप्रसाद द्विवेदी स्मृति व्याख्यानमाला में ‘उपन्यास का भूगोल’ और ‘उपन्यास की मुक्ति’ विषय पर दो व्याख्यान। उपन्यास का समाशास्त्र अध्ययन अनुसन्धान योजना के लिए उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा रंगनाथ फेलोशिप।

    प्रकाशित कृतियाँ:

    कविता: उजली हँसी के छोर पर (1960), अगली शताब्दी के बारे में (1981), चौथा शब्द (1993), एक अनायक का वृत्तांत (2004)।

    आलोचना: नई कविता का परिप्रेक्ष्य (1965), हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया (1963), कविकर्म और काव्यभाषा (1975), उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा (1975), जैनेन्द्र और उनके उपन्यास (1976), समकालीन हिन्दी कविता का व्याकरण (1980), समकालीन कविता का यथार्थ (1988), शब्द और मनुष्य (1988), उपन्यास का पुनर्जन्म (1995) तथा कविता का अर्थात् (1999), कविता का उत्तर जीवन आलोचना (2004)।

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