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  • Pages: 200
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183618816
  •  
    उपेक्षा, भूख, गरीबी में लिपटी आरण्यमुखी आदिवासी अस्मिता में खलल तब नहीं पड़ती जब भूख उन्हें परेशान करती है, अभाव उन्हें तोड़ने लगता है, मौसम की मार से जीना हराम हो जाता है, इन सब के तो वे अभ्यस्त रहे हैं। खलल तब पड़ती है, जब विकास के नाम पर कोई उनके गहरे शान्त जीवन को गंदला करने चला आता है। भरसक वे कंगाल हों लेकिन उनके नीचे खनिज और वन-सम्पदा के कुबेर के खजाने हैं। उनके जीवन, यौवन और खजाने पर लार टपकाते दिकुओं से लेकर मल्टीनेशनल्स और उनके दलालों तक की नजर है और वे उद्वास्त होने और लुटने को अभिशप्त हैं। पहले बिहार और अब झारखंड का ऐसा ही एक क्षेत्र है संताल परगना। संजीव ने इस उपन्यास के माध्यम से इस आदिवासी अंचल के खनन-दोहन और उसके प्रतिरोध में उठती आदिवासी चेतना, लूट की सरकारी और निजी योजनाओं के विरुद्ध ‘जनखदान’ जैसे वैकल्पिक मॉडलों की तलाश तब शुरू की थी जब इस विषवृक्ष का अंकुर मात्र फूटा था, जो आज पूरे देश के आदिवासी-अस्तित्व के लिए विकराल दानव बन चुका है। विकास के नाम पर विनाश, उद्भव के नाम पर पराभव और शौर्य की परम्परा को दलाल-परम्परा में रेड्यूस करने के विरुद्ध एक सक्षम प्रतिवाद है ‘धार’। ‘धार’ आदमी की भोथरी होती हुई ‘धार’ का संधान है। ‘धार’ की अतिरिक्त विशिष्टता है उपन्यास की नायिका मैना जो प्रेमचन्द के ‘गोदान’ की धनिया और एमिल जोला के ‘जर्मिनल’ की माहेदी की दुर्धर्ष नायिकाओं की परम्परा की अगली और अधुनातन कड़ी है। बाहरी और अन्दरूनी पचासों झंझावातों से जूझती, दलाल बनते जा रहे पिता, पति, पुत्री, परिजन, पुरजन और पतनशील परम्पराओं से जूझती ‘मैना’ हिन्दी का अविस्मरणीय चरित्र है।

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    Sanjeev

    जन्म: 6 जुलाई, 1947 को बांगर कलाँ गाँव, सुलतानपुर (उ.प्र.)।

    सनदों में नाम: राम सजीवन प्रसाद।

    शिक्षा: बी.एस-सी., ए.आई.सी. (भारत); शिक्षा-दीक्षा और नौकरी पश्चिम बंगाल में।

    प्रकाशित रचनाएँ: कहानी-संग्रह: तीस साल का सफरनामा, आप यहाँ हैं, भूमिका और अन्य कहानियाँ, प्रेतमुक्ति, दुनिया की सबसे हसीन औरत, ब्लैक होल, खोज, गति का पहला सिद्धान्त, गुफा का आदमी, दस कहानियाँ, गली के मोड़ पर सूना-सा कोई दरवाजा, संजीव की कथायात्रा: पड़ाव: 1,2,3; उपन्यास: किशनगढ़ के अहेरी, सर्कस, सावधान! नीचे आग है, धार, पाँव तले की दूब, जंगल जहाँ शुरू होता है, सूत्रधार, आकाश चम्पा, रह गईं दिशाएँ इसी पार; बाल उपन्यास: रानी की सराय, डायन।

    कृतियों पर फिल्में: सावधान! नीचे आग है उपन्यास पर काला हीरा नामक टेलीफिल्म, ‘प्रकाश झा प्रोडक्शन’ द्वारा हिमरेखा कहानी पर फिल्म निर्माणाधीन; श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म वेल डन अब्बा कहानी फुलवा का पुल पर आधारित।

    सम्मान: प्रथम पुरस्कार: सारिका: सर्वभाषा कथा प्रतियोगिता, 1980; प्रथम कथाक्रम सम्मान लखनऊ, 1997; इंदु शर्मा स्मृति अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, 2001; भिखारी ठाकुर लोक सम्मान, 2005; ‘पहल’ सम्मान, 2006; सुधा स्मृति सम्मान, 2008।

    सम्प्रति: राइटर इन रेजीडेंस, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)।

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