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Dharm Aur Gender

Dharm Aur Gender

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  • Pages: 232
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126730193
  •  
    जेंडरगत मानसिकता से ग्रस्त नागरिकों के निर्माण और पुनर्निर्माण में धर्म की भूमिका से संबंधित अध्ययन की ज़रूरत सिर्फ यह मान लेने के चलते ही नहीं है कि धर्म रोज़मर्रा के हमारे जीवन के संरचनात्मक ढाँचे में रची-बसी एक प्रभावशाली संस्था है, बल्कि अब यह ज़रूरत इसलिए और ज़्यादा है क्योंकि वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में हमारी अस्मिताओं को लामबंद करने या मज़बूत बनाने में भी यह प्रभावी भूमिका निभा रहा है। यह संचयन दो भागों में विभाजित है। पहले भाग के अंतर्गत दस आलेखों का संकलन है जो भारत, पाकिस्तान और चीन से संबंधित हैं। इन आलेखों को तीन विषयवस्तुओं के तहत बाँटा गया है। पहली विषयवस्तु में शामिल तीन आलेख जाति और धर्म के बीच अंतर्संवाद और उसके जेंडरगत परिणामों के बारे में सैद्धांतिक चर्चा करते हैं। दूसरी विषयवस्तु में वे आलेख समाहित हैं जो भिन्न-भिन्न तरी$कों से जेंडर का निर्माण करनेवाले सांस्थानिक मानकों और नियमों की श्रेष्ठता के आत्मसातीकरण की चर्चा करते हैं। तीसरी श्रेणी में उन लेखों को शामिल किया गया है जो सीधे तौर पर महिलाओं के आंदोलन से संबंधित हैं या जहाँ धर्म के साथ नारीवादी संबद्धता है। इस अंतर्संबंध की अभिव्यक्ति अस्मिता-विमर्श, कट्टरपंथी सामूहिकता या धार्मिक-राजनीतिक आंदोलनों के रूप में होती है। संचयन के दूसरे भाग में धार्मिक दृष्टि से महिलाओं के आचरण-संबंधी मानकों को निर्देशित करनेवाली हिंदी और उर्दू की एक-एक प्रचलित पुस्तक ('बहिश्ती जेवर' और 'नारी शिक्षा') के चुनिंदा हिस्सों को शामिल किया गया है। ये उपदेशात्मक पुस्तकें हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के आचरण और व्यवहार से जुड़ी जेंडरगत परम्पराओं को मज़बूत करती हैं। आशा है, पाठकों के सहयोग से यह शुरुआत एक सफल अंजाम तक पहुँचेगी।

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    प्रो. इलीना सेन 

    इलीना सेन पिछले तीन दशक से महिलाओं और दूसरों के अधिकारों के लिए होनेवाले आन्दोलनों में सक्रिय रही हैं। शिलोंग, कोलकाता और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित इलीना का शोध और लेखन अधिकांशत: महिलाओं के राजनीति, जीविका सम्बन्धित विषयों, संवहनीय मुद्दों, कृषि-जैवविविधता और शांति पर आधारित रहा है। आप महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय, वर्धा और टाटा इंस्टीट्यूट ऑ$फ सोशल साइंस, मुंबई में प्रोफेसर रह चुकी हैं। आपकी प्रकाशित किताबों में प्रमुख हैं—'ए स्पेस विथिन द स्ट्रगल' (1990) और 'सुखवासिन : द माइग्रेंट वुमन ऑफ छत्तीसगढ़' (1995) हैं।  

     

    डॉ. ज़ेबा इमाम

    ज़ेबा इमाम का पालन-पोषण अलीगढ़  (उत्तर प्रदेश) में हुआ, जहाँ उनके अब्बू अंग्रेजी साहित्य के सेक्युलर प्रोफेसर थे। यहाँ सेक्युलर शब्द पर इसलिए जोर दिया जा रहा है क्योंकि ज़ेबा ने हमेशा कहा है कि वो दिवाली पर मिठाई, क्रिसमस पर केक और ईद पर सेवैयाँ खाकर बड़ी हुई हैं। उन्होंने स्नातक अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय से किया और आगे का अध्ययन जामिया मिलिया इस्लामिया में और पी-एच.डी. टेक्सास यूनिवर्सिटी, यू.एस.ए. से। आजकल आप कम्बोडिया और यू.एस. के सोशल सेक्टर में काम करती हैं। जेंडर और सेकुलरिज्म पर लेखन के अलावा आपकी पॉटरी में भी विशेष दिलचस्पी रही है।

     

    डॉ. सुप्रिया पाठक

    18 जनवरी, 1983, सासाराम (बिहार) में जन्मी डॉ. सुप्रिया ने अपने शोध में प्रतिरोध की संस्कृति, नुक्कड़ नाटक और महिलाएँ, पारसी रंगमंच से नुक्कड़ नाटकों तक का निर्देशन एवं अभिनय किया है।

    उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं—स्त्री एवं रंगमंच, धर्म एवं जेंडर : धर्म संस्था के जरिए जेंडरगत मानस का निर्माण, (सह-संपादन)। साथ ही विभिन्न पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में कई विषयों पर आलेख प्रकाशित।उनके विमर्शों में मिथकों में स्त्री अस्मिता और भीष्म साहनी; राष्ट्र, आख्यान एवं राष्ट्रवाद की परिधि में जेंडर के प्रश्न; स्त्री अध्ययन का वर्तमान भारतीय परिदृश्य; हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श एवं समकालीन चुनौतियाँ, इत्यादि प्रमुख हैं।

     

    संपर्क : डी-1, शमशेर संकुल, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, गांधी हिल्स, वर्धा, महाराष्ट्र-442005

    ई-मेल : womenstudieswardha@gmail.com

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