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Ek Aur Mrityunjay

Ek Aur Mrityunjay

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  • Pages: 211p
  • Year: 2014, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318092
  •  
    मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ शोषण, अन्याय, अत्याचार, अन्ध- विश्वास और सर्वग्रासी भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील रचनाकार मन की तीखी प्रतिक्रियाएँ हैं, जिनके माध्यम से वह इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध एक प्रतिकूल वातावरण तैयार करने की चेतना जाग्रत करते हैं । इस तरह उनकी कहानियाँ कथा-सूत्रों एवं चरित्रों के माध्यम से सभ्यता की समीक्षा भी हैं । मिथिलेश्वर अपनी इन लम्बी कहानियों में हमारे समय की ज्वलन्त समस्याओं को उनके अन्तर्विरोधों के साथ मारक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे ये कहानियाँ अनियन्त्रित, अमर्यादित, अपसंस्कृति को बेनकाब करती हुई वर्गीय चेतना को प्रामाणिक रूप में व्यक्त करती हैं । लोगों की बद्धमूल धारणाएँ, मानसिक पिछड़ा- पन, बदलते सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध, पारिवारिक ढाँचे में बदलाव, धर्म, संस्कृति एवं अर्थसत्ता का अन्तर्सम्बन्ध, असहिष्णुता, संवेदनहीनता और संकीर्णता में अनपेक्षित वृद्धि, सत्ता की संस्कृति एवं लोकतन्त्र की पतनशीलता के परिणाम-जैसे पक्ष इन लम्बी कहानियों की संरचनाओं में समाहित है । इन कहानियों को पढ़ते हुए कुछ समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ भी स्पष्ट होती हैं । असहाय एवं उपेक्षित लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टि और उनके अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास इन लम्बी कहानियों को सार्थक एवं सफल बनाते हैं । इन कहानियों में जीवन का राग है तथा तपती और खुरदरी जमीन पर नंगे पाँव चलने का एहसास है । इस रूप में ये कहानियाँ पाठकों के अन्दर आलोचनात्मक विवेक जागृत करने में सक्षम एवं सफल हैं 1 कहने की आवश्यकता नहीं कि मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ असाधारण महत्त्व की कहानियाँ हैं, जो न सिर्फ पठनीय है, बल्कि संग्रहणीय एवं उल्लेखनीय भी हैं ।

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    Mithileshwar

    मिथिलेश्वर

    जन्म : 31 दिसम्बर, 1950, बैसाडीह, भोजपुर (बिहार)

    शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी. (हिन्दी साहित्य)

    साहित्य-सेवा : कहानी संग्रह-एक और मृत्युन्जय, बाबूजी, बंद रास्तों के बीच, दूसरा महाभारत, मेघना का निर्णय, तिरिया जनम, हरिहर काका, एक में अनेक, एक थे प्रो. बी. लाल, भोर होने से पहले, चल खुसरो घर आपने तथा जमुनी ।उपन्यास- झुनिया, युद्धस्थल, प्रेम न बाडी उपजै, यह अन्त नहीं, सुरंग में सुबह, माटी कहे कुम्हार से ।आत्मकथा -पानी बीच मीन पियासी, कहाँ तक कहें युगों की बात, जाग चेत कुछ करौ उपाई ।लोक साहित्य- भोजपुरी लोककथाएँ।नबसाक्षरोपयोगी- उस रात की बात, बाल-साहित्य-गाँव के लोग, एक था पंकज | विचार साहित्य-साहित्य की  सामयिकता । संचयन-मेरी पहली रचना, संपादन- 'मित्र' अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका । पुरस्कार : अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, अमृत पुरस्कार, अखिल भारतीय वीर सिह देव पुरस्कार, श्रीलाल शुक्ल इफ्को स्मृति सम्मान से विभूषित ।सम्प्रति-सेवानिवृत्त, प्रोफ़ेसर/लेखन कार्य के लिए पूर्वकालिक |

    सम्पर्क : महराजा हाता, आरा- 802301 (बिहार)

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