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Gair Sarkari Sangthan

Gair Sarkari Sangthan

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  • Pages: 175P
  • Year: 2010
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788126717835
  •  
    भारत सहित पूरे संसार में गैर सरकारी संगठनों का एक आन्दोलन ही इन दिनों सक्रिय है । इस माध्यम से सजग नागरिकों के द्वारा अपने समुदाय और समाज के कल्याण के लिए कार्य करने में एक इतिहास ही रच दिया गया है । पर गैर सरकारी संगठन का निर्माण कर लेना जितना सरल है, उसका निर्वाह करना उसकी तुलना में कहीं अधिक जटिल है । सामान्यतौर पर सरकारें गैर सरकारी संगठनों के साथ काम करने को उत्सुक रहती हैं, परन्तु भारत जैसे देश में नौकरशाही इनसे अप्रसन्न ही बनी रहती है । राजनैतिक प्रतिरो/ा भी कुछ कम नहीं होता । तब भी एक बेहतर सोच लेकर चलने वाले लोगों के लिए काम करने और नतीजे निकाल लाने की सम्भावना कुछ कम नहीं है । आखिर वे कौन से तत्त्व हैं, जो एक समर्पित गैर सरकारी संगठन की वास्तविक पूँजी होते हैं । ऐसे ही सवालों से जूझती है यह पुस्तक ।

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    Rajendra. Chadrakant Ray

    राजेंद्र चंद्रकांत राय
    जन्म : 5 नवम्बर 1953, जबलपुर म.प्र.।
    शिक्षा : रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि, बी.एड.। राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा नेट, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट, इग्नू, दिल्ली।
    अध्यापन के क्षेत्रा में आजीविका की शुरुआत। परिक्रमा पर्यावरण शिक्षा संस्थान के निदेशक के रूप में सक्रिय। राजीव गांधी जलग्रहण क्षेत्रा प्रबन्धन मिशन मध्यप्रदेश शासन के परियोजना अधिकारी के रूप में 1997-2003 तक वाटरशेड प्रबन्धन का सफल क्रियान्वयन।
    आकाशवाणी, जबलपुर से पर्यावरण रेडियो पत्रिका ताकि बची रहे हरियाली का 1992 से 1999 तक सम्पादन। कृषि परिक्रमा कार्यक्रम का संयोजन तथा आकाशवाणी, जबलपुर के लिए ही औषधीय फसलों की कृषि विधि पर आधारित उत्तम : स्वास्थ्य कार्यक्रम हेतु 13 ऐपिसोड का स्क्रिप्ट-लेखन। नाटक : सहòबाहु का प्रसारण, त्रिपुरी की इतिहास गाथा शीर्षक 13 ऐपिसोड का स्क्रिप्ट लेखन।
    ‘नवभारत’ तथा ‘नवभास्कर’ समाचार-पत्रों में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन। अनेक नाटकों, नुक्कड़ नाटकों में अभिनय एवं निर्देशन। मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली की जूनियर फैलोशिप 1992 के अन्तर्गत उपन्यास-लेखन।
    कृतियाँ : इतिहास के झरोखे से, कल्चुरि राजवंश का इतिहास, कामकंदला (उपन्यास), बेगम बिन बादशाह (कहानी संग्रह), दिन फेरें घूरे के, बिन बुलाए मेहमान, क्योंकि मनुष्य एक विवेकवान प्राणी है, आओ पकड़ें टोंटी चोर, तरला-तरला तितली आई, काले मेघा पानी दे, चलो करें वन का प्रबन्धन, (नुक्कड़ नाटक) तथा सामान्य पर्यावरण ज्ञान, पेड़ों ने पहने कपड़े हरे (पर्यावरण गीत)।
    कुछ कहानियों का तमिल तथा तेलुगू भाषा में अनुवाद।
    सम्पर्क : परिक्रमा, 1234, जे.पी. नगर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.)।

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