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Ghar Ka Jogi Jogda

Ghar Ka Jogi Jogda

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  • Pages: 135p
  • Year: 2018, 4th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126714940
  •  
    घर का जोगी जोगड़ा-- ‘गरबीली गरीबी वह’ के बारे में ‘अद्भुत रचना है काशी का संस्मरण - जिस उ$ष्मा, सम्मान और समझदार संयम से लिखा गया है, वह पहली बार तो अभिभूत कर लेता है। मैं इसे नामवरी सठियाना-समारोह की एक उपलब्धि मानता हूँ। साथ ही मेरी यह राय भी है कि अगर ऐसी कलम हो तो हिटलर को भी भगवान बुद्ध का अवतार बनाकर पेश किया जा सकता है। (मज़ाक अलग) व्यक्तित्व के अन्तर्विरोधों पर भी कुछ बात की जाती तो शायद और ज़्यादा जीवन्त संस्मरण होता! - राजेन्द्र यादव ‘घर का जोगी जोगड़ा’ के बारे में ‘काशीनाथ सिंह का आख्यानक उनके रचनात्मक गद्य की पूरी ताकत के साथ सामने आया है। काशी के पास रचनात्मक गद्य की जीवंतता है - गहरे अनुभव-संवेदन हैं। उनकी भाषा को लेकर और अभिव्यक्ति भंगिमाओं को लेकर काफी कुछ कहा गया है, परन्तु जो बात देखने की है वह यह है कि अपनी जमीन और परिवेश से काशी का कितना गहरा रिश्ता है। संस्मरण को जीवन्त बना देने का कितना माद्दा है। काशी पूरी र्उ$जा में बहुत सहज होकर लिखते हैं और जब ‘भइया’ सामने हों तो वे अपनी रचननात्मकता के चरम पर पहुँचते हैं और महत्त्वपूर्ण के साथ-साथ तमाम मार्मिक और बेधक भी हमें दे जाते हैं। - डॉ. शिवकुमार मिश्र बहुपठित, बहुचर्चित, बहुप्रशंसित संस्मरण हैं ये कथाकार भाई काशीनाथ सिंह के। केन्द्र में हैं हिन्दी समीक्षा के शिखर पुरुष नामवर सिंह के जीवन के अलग-अलग दो संघर्षशील कालखंड! विशेष बात सिर्फ यह कि यदि ‘गरबीली गरीबी वह’ ने संस्मरण विधा को पुनर्जीवन के साथ नई पहचान दी थी तो ‘घर का जोगी जोगड़ा’ ने उसे नई उँ$चाई और सम्भावनाएँ।

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    Kashinath Singh

    जन्म : 1 जनवरी, 1937, बनारस जिले के जीयनपुर गाँव में ।

    शिक्षा : आरम्भिक शिक्षा गाँव के पास के विद्यालयों में। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. (1959) और पी-एच.डी. (1963)।

    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे।

    पहली कहानी 'संकट' कृति पत्रिका (सितम्बर, 1960) में प्रकाशित।

    कृतियाँ : लोग बिस्तरों पर, सुबह का डर, आदमीनामा, नई तारीख, सदी का सबसे बड़ा आदमी, कल की फटेहाल कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, कहानी उपख्यान (कहानी-संग्रह); घोआस (नाटक); हिन्दी में संयुक्त क्रियाएँ (शोध); आलोचना भी रचना है (समीक्षा); अपना मोर्चा, रेहन पर रग्घू, महुआचरित, उपसंहार (उपन्यास); याद हो कि न याद हो, आछे दिन पाछे गए (संस्मरण), गपोड़ी से गपशप (साक्षात्कार)।

    अपना मोर्चा का जापानी एवं कोरियाई भाषाओं में अनुवाद। जापानी में कहानियों का अनूदित संग्रह। कई कहानियों के भारतीय और अन्य विदेशी भाषाओं में अनुवाद। उपन्यास और कहानियों की रंग-प्रस्तुतियाँ। 'तीसरी दुनिया' के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के सम्मेलन के सिलसिले में जापान-यात्रा (नवम्बर, 1981)।

    सम्मान : कथा सम्मान, समुच्चय सम्मान, शरद जोशी सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान और 'रेहन पर रग्घू' उपन्यास  के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, रचना समग्र पुरस्कार।

    सम्प्रति : बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन।

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