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Hindi Upanyas Ka Vikas

Hindi Upanyas Ka Vikas

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  • Pages: 238p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180313905
  •  
    इस बात को जब-जब दोहराया जाता रहा है कि हिन्दी की आलोचना मुख्यत: काव्य केन्द्रित रही है । लेकिन स्वाधीनता के बाद कथा साहित्य में आए रचनात्मक विस्फोट के परिणामस्वरूप आलोचना के केन्द्रबिन्दु में भी बदलाव आना स्वाभाविक था । इसी दौर में कहानी की तरह उपन्यास में भी जिन कुछेक आलोचकों ने सक्रिय, निरन्तर और सार्थक हस्तक्षेप किया है उनमें मधुरेश का उल्लेख विशेष सम्मान के साथ किया जाता है । अपनी आलोचनात्मक उपस्थिति से उन्होंने आलोचना के प्रति छीजते हुए विश्वास की पुर्नप्रतिष्ठा के लिए गहरा और निर्णायक संघर्ष किया है । उपन्यास का सामाजिक यथार्थ से गहरा और अनिवार्य रिश्ता है । आलोचकों ने उसे ऐसे ही गद्य में लिखित महाकाव्य के रूप में परिभाषित नहीं किया है । जीवन की समग्रता में, उसमें निहित सारी जटिलता और अंतर्विरोधों के साथ, अंकित करने की अपनी क्षमता के कारण ही अपेक्षाकृत बहुत कम समय में उसने यह गौरव हासिल किया है । 'हिन्दी उपन्यास का विकास' लगभग एक सौ बीस वर्षों के हिन्दी उपन्यास को उसके सामाजिक संदर्भो में देखने और आकलित करने का एक उल्लेखनीय प्रयास है । आज जब उपन्यास में रूपवादी रूझान, निरुद्देश्यता और भाषाई खिलंदरापन घुसपैठ कर रहे हैं, मधुरेश की 'हिन्दी उपन्यास का विकास' सामाजिक यथार्थ की जमीन पर उपन्यास को देखने परखने का उपक्रम करने के कारण ही विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करती है । यहाँ मधुरेश एक व्यापक फलक पर उपन्यासकारों, विभिन्न प्रवृत्तियों और वैचारिक आदोलनों की वस्तुगत पड़ताल में गंभीरता से प्रवृत्त दिखाई देते हैं । उनकी विश्वसनीय आलोचना- दृष्टि और साफ-सुथरी भाषा में दिए गए मूल्य-निर्णय, 'हिन्दी उपन्यास का विकास' को एक गंभीर आलोचनात्मक हस्तक्षेप के रूप में स्थापित करती है- उपन्यास की मृत्यु और उसके भविष्य संबंधी अनेक बहसों और विवादों को समेटते हुए ।

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    Madhuresh

    मधुरेश
    जन्म : 10 जनवरी, 1939 को बरेली में एक निम्न-मध्यवित्त परिवार में हुआ। उनकी सारी पढ़ाई वहीं हुई। बरेली कॉलेज, बरेली से अंग्रेजी और हिन्दी में एम.ए.। कुछ वर्ष अंग्रेजी पढ़ाने के बाद लगभग तीस वर्ष शिवनारायण दास पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, बदायूँ के हिन्दी विभाग में अध्यापन। 30 जून, 1999 को सेवानिवृत्त होकर पूरी तरह साहित्य में सक्रिय।
    प्रकाशित कृतियाँ : आज की हिन्दी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया, यशपाल के पत्र, सिससिला : समकालीन कहानी की पहचान, क्रान्तिकारी यशपाल : एक समर्पित व्यक्ति (सं.), देवकीनन्दन खत्री (साहित्य अकादमी के लिए), सम्प्रति : समकालीन हिन्दी उपन्यास में संवेदना और सरोकार, रांगेय राघव (साहित्य अकादमी के लिए), राहुल का कथा-कर्म, हिन्दी कहानी का विकास, हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश, हिन्दी उपन्यास का विकास, नई कहानी : पुनर्विचार, यह जो आईना है (संस्मरण), 'परिवेश' के आलोचक प्रकाश चन्द्र गुप्त पर केन्द्रित अंक के अतिथि सम्पादक, अमृतलाल नागर : व्यक्तित्व और रचना संसार, भैरव प्रसाद गुप्त (साहित्य अकादमी के लिए), मैला आँचल का महत्त्व (सं.), दिव्या का महत्त्व, और भी कुछ, हिन्दी उपन्यास : सार्थ की पहचान, यशपाल के पत्र, कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार, हिन्दी आलोचना का विकास, मेरे अपने रामविलास, भारतीय लेखक : यशपाल पर केन्द्रित विशेषांक के अतिथि सम्पादक, यशपाल रचना संचयन (सं.) (साहित्य अकादमी के लिए), यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश, बाणभट्ट की आत्मकथा : पाठ और पुर्नपाठ (सं), यशपाल रचनावली की भूमिकाएँ, माक्र्सवादी आलोचना और फणीश्वर नाथ रेणु (सं.), जुझार तेजा : लज्जाराम मेहता (सं.) रजिया सुल्ताना बेगम उर्फ  रंग महल में हालाहल : किशोरी लाल गोस्वामी (सं.), अश्क के पत्र, सौन्दर्योपासक ब्रजनन्दन सहाय (सं.)।
    सम्मान : समय माजरा सम्मान, राजस्थान (2004), गोकुल चन्द्र शुक्ल, आलोचना पुरस्कार, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान, वाराणसी (2004), राज्यपाल/कुलाधिपति द्वारा महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् में नामित (2009)।
    सम्पर्क : 372, छोटी बमनपुरी, बरेली-243003
    फोन : (0581) 2554670   मोबा. 9319838309

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