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Isliye Kahungi Main

Isliye Kahungi Main

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  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183616218
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    यह दर्ज करना उचित होगा कि इधर की हिन्दी कविता में अभिधा के प्रति बढ़ती उदासीनता के बावजूद सुधा उपध्याय उसकी शक्ति और सम्भावनाओं का अन्वेषण करने से नहीं हिचकतीं और सीधी बात को सीधे तरी$के से कहने में संकोच नहीं करतीं... उन सबका आभार / जिनके नागपाश में बँधते ही /यातना ने मुझे रचनात्मक बनाया उनका भी हृदय से आभार / जिनके घात-प्रतिघात / छल छद्म के संसार में / मैं घंटे की तरह बजती रही। / मेरे आत्मीय शत्रु / तुमने तो वह सबकुछ दिया / जो मेरे अपने भी न दे सके। यहाँ कटुता या प्रतिहिंसा नहीं, जीवन की शर्तों का सामना उद्वेगरहित भाव से करनेवाला साहस है। वह इस कवयित्री को 'अबला जीवन, हाय तुम्हारी यही कहानी—आँचल में है दूध और आँखों में पानीÓ वाली पारम्परिकता से तो भिन्न बनाता ही है; बल्कि सुधा उपाध्याय की इन कविताओं में जो नारी-चेतना आदि से अन्त तक फैली हुई है, वह न अबला की 'हायÓ से शुरू होती है, न जगत के दुख-संकटमय जन्त्र को 'चकनाचूरÓ करने की दुराशा में खत्म दिखती है। उलटे, वह हालात को बदलने में य$कीन करती है जिसके तमाम पड़ावों में से कुछ ये हैं—सुना है वह स्त्री / हो गई है अब खुद के भी खिला$फ / चीख-चीखकर दर्ज करा रही है सारे प्रतिरोध / कहती है, सहना और चुपचाप रहना / कल की बात थी। यदि कोई पूछे कि अँधेरों से लडऩे की $कूवत / औरत, तूने कहाँ से जुटाई / ये आईना जो दरक गया था कभी का / इसे फिर कहाँ से उठा लाई? तो सुधा के पास उत्तर मौजूद है—अब पेंसिलों की धार बनाने से पहले / हँसिए की धार बनानी होगी / दिमा$ग चलाने के साथ, चलाने होंगे हाथ / दूसरों को कहने से पहले / अब दिखाना होगा खुद करके। लेकिन यह समझने के लिए दूर जाना ज़रूरी नहीं कि सुधा को हँसिए की धार बनानी है—खुद करके दिखाने के लिए, न कि प्रतिपक्ष की गरदन रेतने के लिए : जब पक कर खड़ी हो जाए $फसल / बाँट दो बूरा-बूरा / चूरा-चूरा / यही है सृजन। सन्तोष का विषय यह है कि सुधा उपाध्याय की दृष्टि निकट और तत्काल तक सीमित नहीं; वह इतिहास और अतीत को भी अपने फलक का हिस्सा बनाती हैं। वहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खुलने की प्रतीक्षा में होंगे।

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    Sudha Upadhyaya

    डॉ. सुधा उपाध्याय हिन्दी की नवोदित लेखिकाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। डॉ. सुधा लेखिकाओं में अलग भाषा और अलग लेखन की वजह से जानी जाती हैं। कविताओं में वे जितनी राजनीतिक समझ रखती हैं, आलोचनाओं में कृति के सौन्दर्यबोध और उसके तलीय स्वर को पकड़ने का साहस करती हैं। एक शिक्षक होने के नाते समाज के हर उस शख्स के लिए वे आवाज़ उठाती हैं जो शिक्षा से वंचित रह जा रहा है। कविता, कहानी, लेख और आलोचना में इसकी झलक साफ नज़र भी आती है। किसी विमर्श में न पड़कर एक स्वस्थ संवाद कायम करने में वे विश्वास रखती हैं।

    प्रकाशित रचनाएँ :

    बोलती चुप्पी (कविता संग्रह) राधाकृष्ण प्रकाशन।

    हिन्दी की चर्चित कवयित्रियाँ, स्त्री होकर सवाल करती हो, यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री कविता संकलनों में कविताएँ संकलित।

    शीतलवाणी त्रैमासिक पत्रिका में 'उदयप्रकाश साहित्यिक सृजन विशेषांक’ का सहसम्पादन।

    समसामयिक साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

    तमाम साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका।

    सम्प्रति : वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय)।

    sudhaupadhyaya@gmail.com

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