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J.N.U. Mein Namwar Singh

J.N.U. Mein Namwar Singh

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  • Pages: 264p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126717880
  •  
    ‘जे.एन.यू. में नामवर सिंह’ दरअसल स्वयं जे.एन.यू.वासियों की अपनी गाथा है - अपने को उस स्वप्नदर्शी विश्वविद्यालय से जोड़ने की - उसे निरन्तर सुरक्षित रखने और बनाते जाने की अपनी दास्तान... इसमें पुरानी यादें भी हैं, कसक भी है और खुशी भी। खुशी उस यूनिवर्सिटी से जुड़ने की जो न केवल अध्ययन - अध्यापन और शोध में निरन्तर नए प्रयोग कर रही थी बल्कि जो अपनी ईंट-कंकरीट की इमारतों के प्रकृति के साथ संयोजन में भी अनूठापन रच रही थी। जिस समय जे.एन.यू. की इमारतें अरावली की पहाड़ियों पर उभर रही थीं उस समय यूँ तो पर्यावरण की रक्षा पर इतना बल न था - पर वह यूनिवर्सिटी ही क्या जो भविष्योन्मुखी न हो - जो परम्परा से जुड़ती और उससे संवाद न करती हो - जो सर्वहितकारी और जीवन्त न हो... तो जे.एन.यू. स्मृति भी है और प्रकृति भी...

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    Suman Keshari

    जन्म : 15 जुलाई, मुजफ्फरपुर, बिहार ।

    सुमन केशरी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नईं दिल्ली से सूरदास पर शोघ किया है तथा यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, पर्थ से एम बी. ए. ।

    सुमन केशरी लम्बे समय तक भारत सरकार में प्रशासन सम्बन्धी कार्य करती रही हैं | लेखन एवं अध्यापन में गहरी रुचि के कारण सन 2013 में ही उन्होंने भारत सरकार से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर आई.टी.एम. ग्वालियर में मैनेजमेंट का अध्यापन किया । प्रशासन से शोघ एवं अध्यापन तक के गहन व व्यापक अनुभवों के फलस्वरूप सुमन की कविताओं का फलक अत्यन्त विस्तृत है । इन कविताओं की भावसघन और विचारोत्तेजक सृजनात्मकता न केवल रूपविधान में, बल्कि मिथकों के आधुनिक अर्थान्वेषण में भी व्यक्त होसी है | उनकी कविताएँ शब्द की शाश्वतता और निरन्तरता में कवि की आस्था को रेखांकित करती कविताएँ हैं ।

    उनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित है –याज्ञवल्क्य से बहस (2008) और मोनालिसा की आँखे ( 2013) । तीसरा संकलन शब्द और सपने (2015) ई-बुक के रूप में प्रकाशित हैं । मोनालिसा की आँखे संग्रह का अनुवाद मराठी एवं राजस्थानी भाषाओं में हुआ है और उनकी अनेक कविताओं का अनुवाद अग्रेजी फ्रेंच, नेपाली एवं मराठी भाषाओं मेँ हुआ है ।

    इस नए संकलन का कविताओं में, हम कवि को लोकतांत्रिक मिजाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सामने आए संकटों से टकराते हुए तो देखते ही है, साथ ही प्रकृति की उस उपस्थिति से संवाद करते भी देखते है, जो दिनो दिन छीजती चली जा रही है ।

    इन दिनों वे स्वतंत्र लेखन कर रही हैं ।

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