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Jaankidas Tejpal Mansion

Jaankidas Tejpal Mansion

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  • Pages: 184
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727735
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    जानकीदास तेजपाल मैनशन जो सतह पर दिखता है, वह अवास्तविक है। कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यू पर 'जानकीदास तेजपाल मैनशनÓ नाम की अस्सी परिवारों वाली इमारत सतह पर खड़ी दिखती है, पर उसकी वास्तविकता मेट्रो की सुरंग खोदने से ढहने और ढहाए जाने में है। अंग्रेजी में एक शब्द चलठ्ठता है 'अंडरवर्ल्डÓ, जिसका ठीक प्रतिरूप हिन्दी में नहीं है। अंडरवर्ल्ड गैरकानूनी ढंग से धन कमाने, सौदेबाजी और जुगाड़ की दुनिया है। इस दुनिया के ढेर सारे चरित्र हमारे जाने हुए हैं, पर अक्सर हम नहीं जानते कि वे किस हद तक हमारे जीवन को चलाते हैं और कब हमें अपने में शामिल कर लेते हैं। तब अपने बेदखल किए जाने की पीड़ा दूसरों को बेदखल करने में आड़े नहीं आती। जयगोविन्द 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कलकत्ता लौट आया एक कम्प्यूटर इंजीनियर है। वह अपना एक जीवन जयदीप के रूप में अपने अधूरे उपन्यास में जीता है, तो दूसरा जीवन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से लेकर भारत के एक बड़े बाजार में बदलने या 'नेशन स्टेट’ से 'रीयल इस्टेट’ बनने के यथार्थ में। विडम्बना यह नहीं है कि जयगोविन्द का जीवन जयदीप से असम्पृक्त है; बल्कि यह है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है। फर्क इतना भर है कि एक वस्तुनिष्ठ आत्मकथा लिखने की कोशिश में बार-बार अपने को बचाने की मुहिम चली आती है, जो अपने ही लिखे को नहीं मानती। इसी क्रम में आजादी के बाद इस देश की जवान हुई पहली पीढ़ी को मिले धोखे और नाकाम 'सिस्टम’ की दास्तानें अमेरिका के वियतनाम-युद्ध से लेकर विकीलीक्स के धोखे तक फैली हैं। 'अमेरिका’ इस उपन्यास में एक 'मोटिफ’ की तरह है जिसमें विस्थापन के कई स्तर हैं—वहाँ कुछ साल बिताकर लौटा जयदीप है जो न इधर का है न उधर का; उसके एन.आर.आई. मित्र हैं जो इंफेक्शन के डर से इंडिया नहीं आते; वे हैं जो लौटने के लिए तड़प रहे हैं; उसका बेटा रोहित है जो इंडिया को चिड़ियाघर कहता है। सड़क पर गुजरती हर बस के साथ हिलता 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नया अर्थ-संकेत है—पूरे देश का, जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन, पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमजोर को सबसे पहले बेदखल करने में लगा हुआ है।

    Customer Reviews

    जानकी दास तेजपाल मेनशन- अलका सरावगी।। समीक्षा। 'जानकी दास तेजपाल मेनशन' एक बस्तुनिष्ठ ईंट गारे की जर्जर इमारत ही नही बल्कि एक प्रतिकात्मक अर्थ बिस्तार भी है यह जर्जर इमारत जो आगे की ओर झुकी है एक व्यक्ति की गरमाहट व अपनापन भी है बिचार भी है समाज भी है रा Review by Vijay Kumar shukla
    जानकी दास तेजपाल मेनशन- अलका सरावगी।। समीक्षा।
    'जानकी दास तेजपाल मेनशन' एक बस्तुनिष्ठ ईंट गारे की जर्जर इमारत ही नही बल्कि एक प्रतिकात्मक अर्थ बिस्तार भी है यह जर्जर इमारत जो आगे की ओर झुकी है एक व्यक्ति की गरमाहट व अपनापन भी है बिचार भी है समाज भी है राष्ट्र भी है जिसकी ख़ालीपन 'साय साय' व 'सिसकता' है जो उपन्यास मे अन्तर्धारा की तरह संबेदित होता है। यहाँ बेदख़ल होना व बेदख़ल करना दोनो साथ -साथ ध्वनित है।'हथौडा' इमारत के उपरी मंज़िल पर ही नही बल्कि स्मृति व संबेदना पर लगातार चोट कर रहे है। तोड़ने के फ़ायदा व टूटने की अनतरबेदना उपन्यास को लगातार द्वन्द द्वारा जीवंत बनाये हुए है।
    अलका जी का यह उपन्यास स्मृति व वर्तमान व्यवस्था के द्वन्द का आख्यान व उपख्यान का अतिक्रमण कर एक महाख्यान बनाते है। एक ही व्यक्ति जयगोबिन्द व जगदीप स्वयं से ही निर्वासित है कभी कलकत्ता से ते कभी अमेरिका से कभी स्वयं के परतिरूप व व कभी स्वयं लिखे जा रहे अधूरे आत्मकथात्मक उपन्यास से लगातार टकराते है।
    यहाँ अमेरिका समानानतर द्वन्द की तरह आता है। कभी प्रेमिका बीफ खाने वाली मिशेल :कभी वियतनाम :कभी बिकलिक्स :बेटा रोहित तो भारत को जाति व्यवस्था का 'चिड़िया घर 'समझता है जो रिसता रहता है।यहाँ अमेरिका मे हार्न नही बजता ;हर पाबंदी का बिरोध होता है वह समाज जो नारे पोस्टर से आगे सोच नही पाता । यहाँ जयगोबिन्द को सारे लड़ाईयों को ताक़त 'अमेरिका मे ली गयी साँसों से मिला है।'डाउकेमिकल' 'पी एल ४८०' एक प्रतीकात्मक इतिहास की त्रासदी के रूप मे आता है।
    नक्सली देवनाथ व शान्तनु 'जाने ख़ुद मुर्ख बन रहे है या मुर्ख बना रहे है' प्रोफ़ेसर ;रेलवे व मिलीटरी ही बम बनाने का सामान मुहैय्या कराते है।
    आफ़ताब हुसेन जैसा शरीफ़ 'सिर्फ़ डराने धमकाने का चेहरा है उसके पीछे कोई और है जो कभी सामने नही आता'। ' आफ़ताब व पप्पू बनाने के लिए लोग अपने पैसे लगाते है पर जय बाबू बनाने के लिए इससे ज्यादे पैसे' यह सफ़ेदपोश हक़ीक़त है। पर स्मृति एसी है कि लोग मान ही नही पाते कि जय बाबू 'काईंया चालाक व धूर्त है' मिंटू चौधरी 'अख़बार के माध्यम से ब्लैकमेल का धंधा चलाता है' उसके लिए सबसे बड़ी बात 'कनेक्शन ' है सारे संबंध यहाँ 'कनेक्श'न मे बदल जाते है । भ्रष्टाचार यहाँ 'एक्स्टरा दीमाग ' के रूप मे आता है जो सिस्टम को अपने शर्त पर चलाता है' यहाँ 'रूल फालो बाई फूल है'
    अलका सरावगी( Alka Saraogi) जी मे अभी भी 'कलीकथा 'वाली ही ऊर्जा शेष है। जिन्हें शिकायत है कि हिन्दी मे अच्छा नहीं लिँखा जा रहा वे इसे ज़रूर पढ़े।स्मृतियों की इन्द्र धनुषीय जादू । एक पठनीय उपन्यास जो उपन्यास के ही शब्दों मे कहूँ तो 'आउट स्टैडिंग' है। इस साल का यह बेस्ट उपन्यास हो सकता है पुरस्कार तो मिलेंगे ही पर सबसे बड़ा पुरस्कार पाठकों द्वारा की गयी प्रसंशा होती है जिसमें खरी उतरेगी । बेस्ट आफ लक अलका जी। (Posted on 4/25/2015)

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    Alka Saraogi

    अलका सरावगी

    अलका सरावगी का जन्म 1960 ई. के नवम्बर माह में हुआ। आपके पहले ही उपन्यास कलि-कथा : वाया बाइपास को वर्ष 1998 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    अन्य कृतियाँ

    शेष कादम्बरी (बिहारी पुरस्कार), कोई बात नहीं, एक ब्रेक के बाद, जानकीदास तेजपाल मैनशन, एक सच्ची-झूठी गाथा (उपन्यास)। कहानी की तलाश में, दूसरी कहानी (कहानी-संग्रह)।

    जर्मन, फ्रेंच, इटालियन, स्पेनिश, अंग्रेजी तथा अनेक भारतीय भाषाओं में कृतियाँ अनूदित।

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