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Jinna : Ek Punardrishti

Jinna : Ek Punardrishti

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  • Pages: 383p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126709861
  •  
    साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना- शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।

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    Virendra Kumar Baranwal

    वीरेन्द्र कुमार बरनवा

    जन्म : 21 अगस्त, 1941; फूलपुर, आज़मगढ़ (उ.प्र.)।

    माँ गायत्री देवी; पिता दयाराम बरनवाल—स्वतंत्रता सेनानी, भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान जेल-यात्रा, समाजवादी आन्दोलन से गहरा जुड़ाव।

    शिक्षा : बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय; एल-एल.बी., भोपाल विश्वविद्यालय।

    पेशा : कुछ वर्ष अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य का अध्यापन, सन् 1969 से 2005 तक भारतीय राजस्व सेवा (इंडियन रेवेन्यू सर्विस) में, मुख्य आयकर आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त।

    कृतियाँ : ‘पानी के छींटे सूरज के चेहरे पर’ (नाइज़ीरियाई कविताओं के अनुवाद), वोले शोयिंका की कविताएँ (नोबेल पुरस्कार सम्मानित पहले अश्वेत रचनाकार की कविताओं के अनुवाद), ‘पहल’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत ‘रक्त में यात्रा’ (रेड इंडियन कविताओं के अनुवाद) एवं  ‘वो पहला ना$खुदा हिन्दोस्तानी के स$फीने का—वली दक्खिनी’ तथा ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत ‘माची तवारा की कविताएँ’ (युवा जापानी कवयित्री की तन्काओं

    के अनुवाद)—सभी पुस्तकें/पुस्तिकाएँ विस्तृत परिचयात्मक भूमिका के साथ।

    ‘जिन्ना : एक पुनर्दृष्टि’ (जिन्ना तथा उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में विमर्श), ‘हिन्द स्वराज : नव सभ्यता-विमर्श’, ‘रतनबाई जिन्ना’ (नाटक— प्रकाश्य) तीनों राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से।

    अभिरुचियाँ : हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत तथा तुलनात्मक साहित्य के साथ हाशिये पर पड़े साहित्य, $खासकर अश्वेत और रेड इंडियन साहित्य एवं भारतीय पुनर्जागरण तथा स्वतंत्रता-संग्राम के विमर्श में गहरी रुचि।

    पुरस्कार : केंद्रिय हिंदी संस्थान (आगरा) के महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति :  महात्मा गांधी से जुड़ी एक पुस्तक पर काम कर

    रहे हैं।

    सम्पर्क : ‘गायत्री’, बी-72, कौशाम्बी, गाजि़याबाद-201010 (उ.प्र.)।

     

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