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Kahi Na Jay Ka Kahie

Kahi Na Jay Ka Kahie

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  • Pages: 158p
  • Year: 2001
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126701714
  •  
    “मैं यह अच्छी तरह जनता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा ! यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जा सकता ! और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए महत्त्व का नहीं है ! लेकिन अपना नाम सैकड़ों-हजारों वर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस लापरवाही वाली अकड़ के बावजूद, मन के किसी कोने में जब तब उचक-उचक पड़ती है ! “तो मैं भगवतीचरण वर्मा, पुत्र श्री देवीचरण, जाति कायस्थ, रहनेवाला फ़िलहाल लखनऊ का, अपनी आत्मकथा कह रहा हूँ ! कुछ हिचकिचाहट होती है, कुछ हंसी आती है-बेर-बेर एक पंक्ति गुनगुना लेता हूँ-‘कहि न जाय का कहिए !’ तो यह आत्मकथा मैं दूसरों पर अपने को आरोपित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ ! मैं तो यह दूसरों का मनोरंजन करने के लिए कह रहा हूँ !“ लेकिन दुर्भाग्य से यह आत्मकथा पूरी न हो सकी ! अगर पूरी हो गई होती तो निश्चय ही यह हिंदी में एक महत्त्पूर्ण आत्मकथा होती ! ‘चित्रलेखा’, ‘भूले-बिसरे चित्र’, ‘रेखा’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाई’ जैसे उपन्यासों के रचनाकार भगवती बाबू ही यह कह सकते थे कि अपनी आत्मकथा वे दूसरों के मनोरंजन के लिए कह रहे हैं ! इस अधूरी आत्मकथा को किसी हद तक पूरा करने के लिए उनका तीन किश्तों में लिखा एक आत्मकथ्य ‘ददुआ हम पे बिपदा तीन’ भी इस पुस्तक में दिया जा रहा है ! इसमें पाठकों को अपने प्रिय लेखक को समझने के लिए और व्यापक आधार मिलेगा !

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    Bhagwati Charan Verma

    भगवतीचरण वर्म

    30 अगस्त, 1903 को उन्माव जिले (उ॰प्र॰) के शफीपुर गॉव में जन्म ।

    शिक्षा :  इलाहाबाद से बी. ए., एल. एल. बी. ।

    प्रारम्भ में कविता-लेखन । फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात भगवती बाबू 1933 के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे । 1936 के लगभग फिल्म कार्पोरेशन, कलकत्ता में कार्य किया । कुछ दिनो तक ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-सम्पादन और इसके खाद बम्बई में फिल्म-कथा लेखन तथा दैनिक

    'नवजीवन' का सम्पादन । आकाशवाणी के लई केद्रों में भी कार्य । बाद में, 1957 से 'मृत्यु-पर्यत्न स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन ।

    उनके बेहद लोकप्रिय उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर दोबार फ़िल्में बनीं । 'भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादेमी से सम्मानित | पदमभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त ।

    प्रकाशित पुस्तकें

    अपने खिलौने, पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, भूले-बिसरे चित्र, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सीधी सच्ची बाते, धुप्पल, रेखा,

    वह फिर नहीं आई, सबहि नचावत नाम गोसाई, प्रश्न और मरीचिका, युवराज चूण्डा (उपन्यास); प्रतिनिधि

    कहानियाँ,  मेरी कहानियाँ, मोर्चाबन्दी तथा सम्पूर्ण कहानियाँ (कहानी-संग्रह); मेरी कविताएँ; सविनय और एक नाराज कविता (कविता-संग्रह); मेरे नाटक, वसीयत (नाटक); अतीत के गर्त से, कहि न जाय का कहिए (संस्मरण); साहित्य के-सिद्धान्त तथा रूप (सहित्यलोचन); भगवतीचरण वर्मा रचनावली ( 1 4 खंडो में) |

    निधन: 5 अक्टूबर, 1981

     

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