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Kanakdas Ka Kavya

Kanakdas Ka Kavya

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  • Pages: 64
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183618830
  •  
    कनक द्वारा रचित कीर्तन अद्भुत हैं। पौराणिक कथा-सन्दर्भ के सहारे कृष्ण के दशावतार का पहेलीबद्ध ढंग से वर्णन करना कनक काव्य-शैली की विशेषता है। भगवान कृष्ण के चरित्र के आन्तरिक सम्बन्धों का गाँठदार वर्णन और घुमावदार रूप चित्रण-शैली कन्नड़ में मुंडिगे कहलाती है। कवि कनक मुंडिगे लेखन में सिद्धहस्त हैं। कनकदास द्वारा मुंडिगे-शैली का अत्यन्त सशक्त ढंग से प्रयोग और वर्णन से लगता है यह शैली उनके लिए, जात के आधार पर पांडित्य का और काव्यज्ञान का अहंकार बघारनेवाले समकालीन पंडितों की टक्कर में, अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति-कुशलता को दर्शाने का जरिया मात्र थी। कनक की मुंडिगे के अनेक सुन्दर नमूने मिलते हैं। सम्पूर्ण भक्ति साहित्य में कनक के समान मुंडिगे रचयिता विरले ही हैं। अलंकारों के समृद्ध प्रयोग में कनक का सानी दूसरा नहीं। विष्णु के दशावतार का वर्णन और अवतारी कृष्ण के नाना लीलाओं का वर्णन कनकदास ने बहुत ही रमकर एवं जमकर किया है। अपने आराध्य देव की स्तुति में कनक कहीं भी कोताही नहीं करते। लगता है स्तुति के लिए अलग-अलग प्रसंगों की खोज में कनक लगे ही हुए हैं। अपने सगुण साकार सुन्दर और धीरशूर आराध्य देव के हर रूप का, हर कलाओं का वैभवमय वर्णन करते हैं। दास साहित्य के श्रेष्ठ कवि कनकदास भगवान की स्तुति में रूप वर्णन में प्रेमी कृष्ण और प्रेमिका राधा के मध्य की रागात्मक और माधुर्य सम्बन्धों का आधार लेते हैं। प्रेमिका राधा, प्रोषितपतिका राधा, मिलनाकांक्षी राधा ऐसे अनेक रूपों के द्वारा कृष्ण के विविध अवतारों का मुंडिगे-शैली में वर्णन करते हैं। इन लीला-वर्णनों में स्तुतिनिंदा काव्य-रूढ़ि का भी अत्यन्त ही आत्मीय और अद्भुत प्रयोग कनक ने किया है। कनकदास का काव्य पुस्तक में ऐसे ही कनक रचित सुन्दर कन्नड़ मुंडिगे का अनुवाद हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है। —प्रो. परिमला अंबेकर

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    Dr. Parmila Ambekar

    डॉ. परिमला अम्बेकर

     

    प्रो. परिमला अम्बेकर अनुवाद, तौलनिक अनुसन्धान एवं सीमा विधा में अपना वैयक्तिक हस्तक्षेप रखती हैं। अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ अनुसन्धान में भी विशेष रुचि के चलते वे यूजीसी के प्रोजेक्टों पर काम कर चुकी हैं।

    दस से भी अधिक पुस्तकों के प्रकाशन के अतिरिक्त अनेक स्तरीय पत्रिकाओं में शोधपरक आलेखों के जरिए हिन्दी-लेखन में दक्षिण हस्तक्षेप के अपने वैचारिक आयाम को आकार देने के प्रति अधिक सजग हैं।

    अपने लेखन में स्त्रीवादी मुद्दों को उठाते हुए समाज एवं संवेदना के धरातल पर व्यक्ति समानता एवं विकास की चेतना को अत्यन्त ही तल्खी के साथ प्रस्तुत करती हैं। परम्परा एवं वास्तविकता के बृहद् कैनवास पर आधुनिकता एवं प्रगति के पदचिह्नों को उकेरने की लेखकीय निष्ठा उनमें है।

    अनुवाद, समीक्षा के बौद्धिक कर्म को प्रतिबद्धता एवं प्रामाणिकता से निभानेवाली प्रो. परिमला अम्बेकर सृजनात्मक लेखन की कलात्मकता से भी जुड़ाव रखती हैं।

    सम्प्रति : अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुलबर्गा विश्व-विद्यालय, कुलबुर्गी-585106

    ईमेल : parimalaambekar@gug.ac.in

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