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Katha Viraat

Katha Viraat

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  • Pages: 536
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789388211260
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    बँटवारा तो होना था । अवश्यम्भावी था । जब दिल बँट गए मजहब और धर्म के नाम पर तो कौन कब तक किसे अलग होने से रोक सकता था ? दिलों का बँटवारा अब धरती के नक्शे पर उतरना था । भारत का नक्शा, जो सिर्फ एक कागज का टुकडा होते हुए भी कागज नहीं था । वह तो एक ऐसा अदृश्य संसार था जिसमें हजारों-सैकडो सालों से भारतवासियों का सांस्कृतिक प्रवाह, मनुष्यता का जीवन-संघर्ष, कोटि-कोटि बलिदान, असंख्य हास्य-रूदन, नृत्य-गान और अटटहास-कराहों का अतीत और वर्तमान समाया हुआ था । उसमें हल जोतते किसान थे । चूल्हे पर रोटी सेंकती स्त्रियाँ थीं । भेड़-बकरियां-गउए चराते बालक-वृन्द थे । स्कूल जाते अध्यापक, गोद में दुधमुँहे बच्चे खिलाती दादी-नानियॉ थी, दुकान पर माल तोलता बनिया था, काले कोट पहने अदालतों में बहस करते वकील थे, ठेला खींचते मजदूर थे, नोट गिनते लाला जी थे, हकीम साहब थे, मौलवी थे, पंडित थे, चमडा और लकडी के कारीगर थे, एक-दूस्ररे से छिप-छिपकर मिलते प्रेमी-युगल थे. . एक पूरा हैंसता-खेलता अपने जीवन-मरण में डूबा एक भरा-पूरा कलरव करता संसार था , जिसे अब हिन्दू-मुसलमान-सिख के नाम पर एक-दूसरे से अलग किया जा रहा था । उसके लिए 'बाउंड्री' अर्थात-एक निर्मम विभाजन-रेखा खींची जानी अनिवार्य थी । …

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