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Kavita Ka Paksh

Kavita Ka Paksh

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  • Pages: 80p
  • Year: 1994
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: KKP162
  •  
    कविता क्या है, कविता का अर्थ क्या ई, ये किसी भी साहित्य-चिंतन के केन्द्रीय प्रश्न हैं । युग बदलता है, उसके संदर्भ बदलते हैं, पर ये प्रश्न अपनी जगह बने रहते हैं, यद्यपि कि नये संदर्भ में इन प्रश्नों के कोण बदल जाते हैं । तब हर युग के कवि और समीक्षक को, और पाठक भी को, इन समस्याओं से अपने ढंग से निपटना होता है । यहाँ काव्यशास्त्र की शांत स्थिरता अपर्याप्त हो जाती है, साहित्य-चिंतन की गतिशीलता ललकारती है । आधुनिक साहित्य अपनी समीक्षा को शास्त्र न बना रहने देकर उसे सर्जनात्मकता की चुनौती स्वीकारने को प्रेरित करता है । इस नयी भूमिका में समीक्षा या आलोचना कृति साहित्य की प्रतिद्वन्द्वी न होकर उसका विस्तार होती है, और यों जीवनानुभव तथा उसके अर्थ को अधिकाधिक प्रशस्त करती चलती है । रचना जीवन के अर्थ का विस्तार है तो आलोचना रचना के अर्थ का । यों विविध संदर्भो में हर युग की कविता कुछ न कुछ शंकाओं, आरोपों और चुनौतियों से घिरती है । तब किसी न किसी कवि या आलोचक को उसका पक्ष प्रस्तुत करने की जरूरत होती है । सर फिलिप सिडनी, शेले, क्रोचे तथा रामचन्द्र शुक्ल के संदर्भो से सीखता और उन्हें कहीं-कुछ आगे बढ़ाता हुआ अब प्रस्तुत है 'कविता का पक्ष', हर सहृदय पाठक और सुधी समीक्षक के लिए अनिवार्य पाठ्य सामग्री!

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    Ramswarup Chaturvedi

    रामस्वरूप चतुर्वेदी

    जन्म: 1931 ई. में कानपुर में। आरंभिक शिक्षा पैतृक गाँव कछपुरा (आगरा) में हुई। बी.ए. क्राइस्ट चर्च, कानपुर से। एम.ए. की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1952 में। वहीं हिंदी विभाग में अध्यापन (1954-1991)। डी.फ़िल् की उपाधि 1958 में मिली, डी.लिट् की 1972 में।

    आरंभिक समीक्षापरक निबंध 1950 में प्रकाशित हुए। नयी प्रवृत्तियों से संबद्ध पत्रिकाओं का संपादन किया: ‘नये पत्ते’ (1952), ‘नयी कविता’ (1954), ‘क ख ग’ (1963)। शोध-त्रैमासिक ‘हिंदी अनुशीलन’ का संपादन (1960-1984)।

    प्रकाशन: शरत् के नारी पात्र (1955), हिंदी साहित्य कोश (सहयोग में संपादित - प्रथक भाग 1958, द्वितीय भाग 1963), हिंदी नवलेखन (1960), आगरा जिले की बोली (1961), भाषा और संवेदना (1964), अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या (1968), हिंदी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियाँ (1969), कामायनी का पुनर्मूल्यांकन (1970), मध्यकालीन हिंदी काव्यभाषा (1974), नयी कविताएँ: एक साक्ष्य (1976), कविता यात्रा (1976), गद्य की सत्ता (1977), सर्जन और भाषिक संरचना (1980), इतिहास और आलोचक-: ष्टि (1982), हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986), काव्यभाषा पर तीन निबंध (1989), प्रसाद-निराला-अज्ञेय (1989), साहित्य के नये दायित्व (1991), कविता का पक्ष (1994), समकालीन हिंदी साहित्य: विविध परि: श्य (1995), हिंदी गद्य: विन्यास और विकास (1996), तारसप्तक से गद्यकविता (1997), भारत और पश्चिम: संस्कृति के अस्थिर संदर्भ (1999), आचार्य रामचंद्र शुक्ल - आलोचना का अर्थ: अर्थ की आलोचना (2001), भक्ति काव्य-यात्रा (2003)।

    संयुक्त संस्करण: भाषा-संवेदना और सर्जन (1996), आधुनिक कविता-यात्रा (1998)।

    आलोचना: सैद्धांतिक और व्यावहारिक, भाषाशास्त्र तथा विचारों के साहित्य में विशेष रुचि।

    सुषमा के साथ विवाह: 1955। तीन बेटे - विनीत (=पल्लवी), विनय (=दीपा), विवेक (=शेफाली)।

    साधना तथा व्यास सम्मान: 1996

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