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Khalifon Ki Basti

Khalifon Ki Basti

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  • Pages: 251p
  • Year: 2001
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171196233
  •  
    ख़लीफ़ों की बस्ती शिवकुमार श्रीवास्तव का दूसरा उपन्यास है - एक नितांत भिन्न कथा-भूमि पर रचा गया। बिल्लेसुर बकरिया और कुल्लीभाट की परंपरा में यह उपन्यास लेखक के नए अनुभव क्षेत्र का बखान है। बुंदेलखंड में खलिफाओं का माफिया राज चलता है। जोर-जबर्दस्ती से अपनी बात मनवाना, काइयाँपन से कानून की दीवारों में सेंध लगाना तथा शालीनता, मर्यादा और विधि सम्मत जीवन के पक्षधरों को अपना शिकार बनाना इन खलिफाओं की पहचान में शामिल है। इस उपन्यास की बस्ती के खलिफाओं में छोटे-मोटे नेता हैं, पीत-पत्रकार हैं, नकली डॉक्टर हैं, छात्र नेता हैं, ठर्रा उतारने वाले हैं, बेकार तरुण हैं, साधारण व्यापारी हैं जो अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने से गुरेज नहीं करते। सत्ता और प्रतिष्ठान संरक्षित ये शक्तियाँ आज भी वैसी ही हैं जैसे महाभारत काल में थीं - महाभारत का एकलव्य आज सखाराम है और द्रोण - उसके तो कई रूप हैं - विधायक, पुलिस इंस्पेक्टर, डॉक्टर। यह उपन्यास दलित-विमर्श नहीं है, लेकिन दलितों के प्रति सवर्णों के रवैए का रोचक और मार्मिक साक्ष्य अवश्य उपलब्ध कराता है। जाति-विभक्त समाज में जातियों के भीतरी अंतर्घातों और पारस्परिक दाँव-पेंचों की यह कथा हमें विचलित तो करती ही है दुनिया को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देती है। व्यंजक भाषा, बिंब बहुल चित्रण और चुटीले संवादों के कारण ख़लीफ़ों की बस्ती औपन्यासिक प्रवृत्ति का नया उदाहरण है, जो समाज के हाशिये पर पड़ी हुई जातियों और वर्गों को समाज के मुख्य प्रवाह में लाने की रचनात्मक कोशिश करता है।

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    Shivkumar Shrivastava

    सागर विश्वविद्यालय के दर्शन-विभाग में कुछ वर्षों तक अध्यापक। 1 जून, 1977 से फरवरी, 1980 और जून, 1980 से 1985 के सत्र में म.प्र. विधान सभा के सदस्य। लंबी अवधि तक सागर विश्वविद्यालय कुल-संसद और कार्य-समिति के सदस्य। अनेक श्रम-संगठनों और आंदोलनों से संबद्ध। म.प्र. पंचायती राज वित्त एवं ग्रामीण विकास निगम (म.प्र. शासन का उपक्रम) के अध्यक्ष (1988-1989), अध्यक्ष, पूर्व विधायक मंडल, मध्यप्रदेश तथा म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। संरक्षक- अखिल भारतीय अंबिकाप्रसाद दिव्य स्मृति पुरस्कार वितरण समिति, सागर। व्यवसाय से अधिवक्ता।

    संपादन: जागृति मासिक 1953 से 1958 तक।

    प्रकाशित कृतियाँ: उपन्यास: कठपुतलियों का दौर (1989)  तथा ख़लीफ़ों की बस्ती (2000)। कविता- संकलन: भेरी (1945), मृत्यंुजय (1949), चेतना संकल्प- धर्मा (1967), तुम ऋचा हो (1980), शहर सहमा हुआ (1981), समय कागज पर (1983), अरे यार सूरज (1993)। खंड-काव्य: ताजमहल (1950)। लंबी कविता: नई खबर (1951)। गीत-संकलन: अल्पना रचाना (1989)। निबंध-संकलन: संवादहीनता के विरोध में रचनाधर्मिता (1999)।

    बालोपयोगी: जमीन की कथाएँ (1989)। कथा-काव्य: कृष्ण क्यों जीते ? राक्षस क्यों हारा ? (1993)।

    संप्रति: कुलपति, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) पिन: 470 002

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