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Krantikari Yashpal : Ek Samarpit Vyaktitva

Krantikari Yashpal : Ek Samarpit Vyaktitva

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  • Pages: 304p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312588
  •  
    साम्राज्यवादी शोषण और दासता के विरुद्ध उद्वेलित भारत ने जिन नौजवानों को जन्म देकर क्रान्ति की दिशा में बढ़ने को प्रेरित किया, उनमें यशपाल अत्यन्त भास्वर तेजोद्दीप्त, और इसीलिए सबसे भिन्न दिखाई पड़ते हैं। भिन्न इस अर्थ में कि अन्य क्रान्तिकारियों के निकट क्रान्ति जब ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यों और लूट-मार तक सीमित थी, तब यशपाल के निकट इसका कुछ और महत्तर और अधिक व्यापक अर्थ था और वह यह कि शोषणपरक विदेशी शासन से राजनीतिक मुक्ति तो मिले ही, शासन-व्यवस्था (समाज-व्यवस्था) भी बदले; अर्थात् शासन-सूत्र का हस्तान्तरण तो वे चाहते ही थे, शासन-पद्धति में भी परिवर्तन चाहते थे। यही बात यशपाल को उनके अन्य साथियों से भिन्न भूमि पर अवस्थित करती है। वस्तुतः वैचारिक स्तर के जिस उच्च धरातल पर खड़े होकर यशपाल सोच रहे थे, वहाँ तक उनके साथी नहीं पहुँचे थे। यही कारण है कि यशपाल को अपने साथियों के बीच कई भ्रांतियों का शिकार होना पड़ा। रचनाकार के रूप में यशपाल के आविर्भाव के पहले कथा-साहित्य में प्रेमचन्द का अवतरण हो चुका था और कथा-साहित्य को रहस्य-रोमांस तथा तिलिस्म की दुनिया से उबारकर सामाजिक यथार्थ के ठेठ आमने-सामने खड़ा कर वे एक नए प्रवर्त्तन का कार्य सम्पन्न कर चुके थे। सामाजिक यथार्थ के पथ पर चलते हुए एक के बाद एक उनकी अनेक जीवंत उपलब्धियाँ भी सामने आ चुकी थीं। उनके द्वारा हिन्दीभाषी एक विशाल पाठक-समाज की रुचियों का परिष्कार और संस्कार हुआ था। अब वह ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ जैसे उपन्यासों में रस लेनेवाला पाठक-समाज न रहकर ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ जैसी कृतियों को अंगीकार कर चुका था। सामाजिक यथार्थ की राह पर चलते हुए प्रेमचंद ने उसे इतना प्रशस्त कर दिया था कि परवर्ती रचनाकारों को उस पथ पर चलने में किसी भी प्रकार की झिझक और कठिनाई न हो, बशर्ते कि वे सही अर्थों में एक जिम्मेदार लेखन का संकल्प लेकर रचना के क्षेत्र मंे उतरे हों। किन्तु प्रेमचंद जिस चीज़ को पाना चाहकर भी अपनी असामयिक मौत के कारण नहीं पा सके थे, और जो बस कौंधकर ही उनकी परवर्ती रचनाओं में रह गई थी, वह चीज यथार्थ के प्रति वह वैज्ञानिक दृष्टि थी, जो उनके निधन के साथ प्रगतिशील आन्दोलन और समाजवाद का अंग बनकर सामने आई। यशपाल चँूकि इसी प्रगतिशील आन्दोलन की उपज हैं, अतः सहज ही उन्हें यथार्थ के प्रति यह वैज्ञानिक दृष्टि प्राप्त हुई। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही माना जाएगा कि यशपाल यथार्थ को, प्रेमचंद द्वारा मिली इस विरासत को समाजवाद के आलोक में और भी संपन्न करके प्रस्तुत करते। उनके सामने सवाल प्रेमचंद की इस विरासत के संरक्षण का ही नहीं, संवर्धन का भी था, और एक योग्य उत्तराधिकारी के रूप में यशपाल ने उसे संवर्धित भी किया। अपने युग के यथार्थ को जितनी व्यापकता, विस्तार तथा संश्लिष्टता से, उसके सारे ज्वलंत प्रश्नों के साथ यशपाल ने चित्रित किया है, वैसा कम देखने को मिलता है। एक प्रतिबद्ध तथा सामाजिक दृष्टि से संपन्न रचनाकार होने के नाते अपने युग के यथार्थ का चित्रण मात्र करके उन्हांेने छुट्टी नहीं ली है, वरन् वर्तमान जीवन के मूलभूत प्रश्नों को कुरेद-कुरेदकर उन पर तीखी टिप्पणियाँ भी की हैं, सार्थक निष्कर्ष भी दिए हैं। जितनी निर्ममता से उन्होंने युग की सामंतवादी-पूंजीवादी मनोवृत्तियों पर चोट की है, जितनी निर्भीकता से समाज के अतिचार तथा उसके जिम्मेदार व्यक्ति तथा संस्थाओं का पर्दाफ़ाश किया है, जितने दो-टूक ढंग से उच्चवर्गीय नैतिकता तथा झूठी आभिजात्य-भावना के खोखलेपन को उजागर किया है, मध्यवर्गीय आडम्बरों की धज्जियाँ उड़ाई हैं, उतनी ही आत्मीयता से समाज के पिसते हुए जन-समुदाय, किसान, मजदूर, नारी, अछूत, वेश्याओं, पतिताओं तथा ठुकराई गई समस्त मनुष्यता को देखा है, और उसकी आशाओं, आकांक्षाओं, स्वप्नों तथा संघर्षों को उभारा है। यशपाल की यह दृष्टि ही एक प्रगतिशील चेतना से संपन्न यथार्थनिष्ठ रचनाकार के रूप में उन्हें प्रतिष्ठा देती है।

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    Madhuresh

    मधुरेश
    जन्म : 10 जनवरी, 1939 को बरेली में एक निम्न-मध्यवित्त परिवार में हुआ। उनकी सारी पढ़ाई वहीं हुई। बरेली कॉलेज, बरेली से अंग्रेजी और हिन्दी में एम.ए.। कुछ वर्ष अंग्रेजी पढ़ाने के बाद लगभग तीस वर्ष शिवनारायण दास पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, बदायूँ के हिन्दी विभाग में अध्यापन। 30 जून, 1999 को सेवानिवृत्त होकर पूरी तरह साहित्य में सक्रिय।
    प्रकाशित कृतियाँ : आज की हिन्दी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया, यशपाल के पत्र, सिससिला : समकालीन कहानी की पहचान, क्रान्तिकारी यशपाल : एक समर्पित व्यक्ति (सं.), देवकीनन्दन खत्री (साहित्य अकादमी के लिए), सम्प्रति : समकालीन हिन्दी उपन्यास में संवेदना और सरोकार, रांगेय राघव (साहित्य अकादमी के लिए), राहुल का कथा-कर्म, हिन्दी कहानी का विकास, हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश, हिन्दी उपन्यास का विकास, नई कहानी : पुनर्विचार, यह जो आईना है (संस्मरण), 'परिवेश' के आलोचक प्रकाश चन्द्र गुप्त पर केन्द्रित अंक के अतिथि सम्पादक, अमृतलाल नागर : व्यक्तित्व और रचना संसार, भैरव प्रसाद गुप्त (साहित्य अकादमी के लिए), मैला आँचल का महत्त्व (सं.), दिव्या का महत्त्व, और भी कुछ, हिन्दी उपन्यास : सार्थ की पहचान, यशपाल के पत्र, कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार, हिन्दी आलोचना का विकास, मेरे अपने रामविलास, भारतीय लेखक : यशपाल पर केन्द्रित विशेषांक के अतिथि सम्पादक, यशपाल रचना संचयन (सं.) (साहित्य अकादमी के लिए), यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश, बाणभट्ट की आत्मकथा : पाठ और पुर्नपाठ (सं), यशपाल रचनावली की भूमिकाएँ, माक्र्सवादी आलोचना और फणीश्वर नाथ रेणु (सं.), जुझार तेजा : लज्जाराम मेहता (सं.) रजिया सुल्ताना बेगम उर्फ  रंग महल में हालाहल : किशोरी लाल गोस्वामी (सं.), अश्क के पत्र, सौन्दर्योपासक ब्रजनन्दन सहाय (सं.)।
    सम्मान : समय माजरा सम्मान, राजस्थान (2004), गोकुल चन्द्र शुक्ल, आलोचना पुरस्कार, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान, वाराणसी (2004), राज्यपाल/कुलाधिपति द्वारा महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् में नामित (2009)।
    सम्पर्क : 372, छोटी बमनपुरी, बरेली-243003
    फोन : (0581) 2554670   मोबा. 9319838309

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