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Main Shayar Badnaam

Main Shayar Badnaam

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  • Pages: 294p
  • Year: 2006, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126725601
  •  
    हिन्दोस्तान को गीतों का मुल्क कहते हैं ! इसीलिए कि यहाँ की अनगिनत जबानों में हर मौके के लिए अनगिनत लोकगीत हैं ! लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि अगर ये अनगिनत गीत न भी होते तो हिन्दोस्तान को गीतों का मुल्क कहलाने के लिए अकेले आनन्द बख्शी साहब काफी थे ! वो जज्बात की कौन-सी वादी है, वो अहसास की कौन-सी मंजिल है, वो धडकनों की कौन-सी रुत है, वो मोहब्बत का कौन-सा मौसम है और वो जिंदगी का कौन-सा मोड़ है जहाँ सुरों के बादलों से आनंद बख्शी के गीतों की बरखा नहीं होती ? आनंद बख्शी आज के लोक कवि हैं ! वे आज के समाज के शायर हैं ! ब्रिटिश नेशनल म्यूजियम में जहाँ इजिप्ट की पुरानी ममीज राखी हैं, जहाँ हिन्दोस्तान के बादशाहों के शराब के प्याले और खंजर रखे हैं, वहां एक बहुत बड़ा हाल है जहाँ अंग्रेज साहित्यकारों की मेनुस्क्रिप्टस, रफ-बुक्स, नोट-बुक्स राखी हुई हैं शो केसेज में ! वहां शा है, बेकेन है, ऑस्कर वाइल्ड है, शेक्सपियर है, डिकेंस है, शेले है, कीट्स है और वहीँ एक तरफ एक शो केस में बीटल्ज के हाथ का लिखा हुआ एक गीत 'यस्टरडे' भी रखा हुआ है ! इससे दो बातों का पता चलता है ! एक तो यह कि वह कौम बीटल्ज की इज्जत करती है और दूसरे यह कि उस कौम में इतना स्वाभिमान है, आत्मविश्वास है कि वह शेक्सपियर के साथ पाल मैर्काटनी की इज्जत करने में झिझकती और डरती नहीं ! मुझे दुःख से कहना पड़ता है कि हमारे बुद्धिजीवियों में यह आत्मविश्वास अभी तक नही आया है ! आज से तीन सौ साल पहले एक और आनंद बख्शी पैदा हुआ था जिसका नाम था नजीर अकबराबादी ! वह आदमी बेयर फुट पोयट था ! वह गाँव-गाँव जाता था ! डफ पे गीत सुनाता था ! वह गीत लिखता था होली पे, दीवाली पे, फागुन पे, कच्चे बर्तनों पे, तरबूज पे, ककड़ी पे, रीछ के बच्चे पे, भालू के तमाशे पे और उस ज़माने की जितनी literary anthology है उनमे नजीर अकबराबादी का नाम नहीं लिखा गया है ! नजीर अकबराबादी को उसके सौ बरस के बाद लोगों ने डिस्कवर किया और उनकी इज्जत की ! क्या हम दुबारा फिर सौ बरस बाद ही अपनी गलती को मानेंगे ? मैं अपने खून से लिखके दे सकता हूँ कि एक दिन आएगा जब लोग जानेंगे कि आनंद बख्शी का आज के म्यूजिक और आज की शायरी में क्या कंट्रीब्युशन है और उस दिन आनंद बख्शी पे थीसिस लिखी जाएगी, पीएच-डी की जाएगी ! मुझे उनके बहुत से गीत बहुत पसंद हैं और उन्हीं में से एक गीत है-"जिंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मक़ाम वो फिर नहीं आते....!" सच ही तो है ! नए-नए गीतकार आएँगे नए-नए गीत लिखे जाएँगे लेकिन अब आनंद बख्शी दोबारा नहीं आनेवाले ! कहते हैं एक समाज उतना ही सभ्य कहा जा सकता है जितना कि वह अपने लेखक की इज्जत करता है ! मैं अपने नौजवान दोस्त विजय अकेला का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि उन्होंने बख्शी साहब के गीतों का यह संकलन बना के अपने और हमारे सभ्य होने का सबूत दिया है ! - जावेद अख्तर

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    Anand Bakhshi

    आनंद बख्शी

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