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Manav Aur Sanskriti

Manav Aur Sanskriti

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  • Pages: 287
  • Year: 2016, 5th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719136
  •  
    मानवीय अध्ययनों में 'नृतत्व' अथवा 'मानवशास्त्र' का स्थान अत्यंत महत्तपूर्ण है ! इस विषय का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ है और अब तो यह अनेक स्वयंपूर्ण उपभागों में विभाजित होता जा रहा है ! प्रस्तुत पुस्तक नृतत्व कि उस शाखा कि परिचयात्मक रूपरेखा जो मानवीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करती है ! मानव और संस्कृति में विद्वान लेखक ने सांस्कृतिक नृतत्व के सर्वमान्य तथ्यों को भारतीय पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करने का यत्न किया है ! इस सीमित उददेश्य के कारण, जहाँ तक हो सका है, समकालीन सैद्धांतिक वाद-विवादों के प्रति तटस्थता का दृष्टिकोण अपनाया गया है ! हिंदी के माध्यम से आधुनिक वैज्ञानिक विषयों पर लिखने में अनेक कठिनाइयाँ हैं ! प्रमाणिक पारिभाषिक शब्दावली का अभाव उनमे सबसे अधिक उल्लेखनीय है ! इस पुस्तक में प्रचलित हिंदी शब्दों के साथ अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली का उपयोग स्वतंत्रतापूर्वक किया गया है ! मानव और संस्कृति में सात खंडो में विषय के उद्घाटन के बाद मानव का प्रकृति, समाज, अदृश्य जगत, कला और संस्कृति से सम्बन्ध दर्शाया गया है ! अंत में भारत के आदिवासियों के समाज-संगठन पर प्रकाश डाला गया है और उसकी समस्याओं पर विचार किया गया है ! पुस्तक अद्यतन जानकारी से पूर्ण है और लेखक ने अब तक कि खोजों के आधार पर जो कुछ लिखा है वह साधिकार लिखा है !

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    Shyamacharan Dube

    प्रोफेसर श्यामाचरण दुबे (1922) का नाम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के समाजवैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्द है | उनकी पुस्तक इंडियन विलेज को एक क्लासिक के रूप में मान्यता मिली है। उसके अनेक अनुवाद विदेशी और भारतीय भाषाओं में हुए हैं। सामाजिक परिवर्तन, विकास और आधुनिकीकरण पर उनका अभिमत आधिकारिक माना जाता है।

    अंग्रेजी के साथ-साथ वे हिन्दी में भी लिखते रहे। परम्परा, संस्कृति और साहित्य पर सम्मानित भाषण देने के आमंत्रण उन्हें मिलते रहे और उन्होंने स्तरीय पत्रिकाओं में भी समय-समय पर लिखा। वे साहित्य, संस्कृति और समाजविज्ञान के शीर्षस्थ सम्मानों और पुरस्कारों के निर्णायक मंडलों के सदस्य भी रहे हैं।

    प्रकाशित कृतियाँ: मानव और संस्कृति; संक्रमण की पीड़ा; विकास का समाजशास्त्र; परम्परा और परिवर्तन; शिक्षा, समाज और भविष्य; परम्परा, इतिहास बोध और संस्कृति; लोक: परम्परा, पहचान और प्रवाह।

    सम्मान: भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार (1993)।

    निधन: 4 फरवरी, 1996

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