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Manav-Deh Aur Hamari Deh-Bhashayen

Manav-Deh Aur Hamari Deh-Bhashayen

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Special Price Rs. 2,250

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  • Pages: 767p
  • Year: 2015
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180319662
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    यह एक विलक्षण संहिता है जो मानवदेह तथा अनेकानेक देह्भाषाओं के विश्वकोश जैसी है ! इसे अध्ययन-कक्ष, श्रृगार-मेज, ज्ञान-परिसंवाद तथा रात्रि-शय्या में बेधड़क पास एवं साथ में रखना वांछनीय होगा ! यह अद्यतन ‘देह धुरीण विश्कोश’ अर्थात अकुंठ ‘बॉडी इनसाइक्लोपीडिया’ है ! पंद्रह वर्षो की इतस्ततः अन्विक्षा-अन्वेषण-अनुप्रयोग से यह रचनी गई है ! इसके लिए ही कृती-आलोचिन्तक को निजी तौर पर अमेरिका में मिशिगन (डेट्राइट) में अपनी बेटी मधुछंदा के यहाँ प्रवास करना पड़ा था ! इसका प्रत्येक पन्ना, रेखाचित्र, चित्र चार्ट सबूत हैं कि “मानवदेह और हमारी देह्भाषाएं” अंतर-ज्ञानानुशासनात्मक उपागम द्वारा समाजविज्ञानों, कला, साहित्य, समाजेतिहास आदि से संयुक्त ‘सांस्कृतिक-पैटर्न’ का भी एक प्रदर्श है ! तथापि इसके निर्णायक तो आप ही हैं !! यह ‘ग्रन्थ’ क्षयिष्णु कुंठाओं, रूढ़ वर्जनाओं-अधोगामी पूर्वाग्रहों के विरुद्ध, अतः उनसे विमुक्त होकर, शालीनता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ततः आम आदमी की बेहतर भोतिक जिंदगानी की समझदारी से प्रतिबद्ध है ! इसमें भारत, रूस, अमेरिका, रोम, मेक्सिको, इजिप्त के कला-अलबमों तथा ग्राथाकारों और मयूज़ियमो का भी नयाग इस्तेमाल हुआ है ! यह दस से भी जयादा वर्षो की तैयारी द्वारा अमेरिका-प्रवास में संपन्न हुआ है ! लक्ष्य है : असंख्य-बहुविध प्रासंगिक सूचनाएँ देना, ज्ञान के बहुआयामी-अल्पज्ञात क्षितिजों को खोजना, तथा मानवदेह और उसकी विविध देह्भाषाओं का वर्गीकरण, शिक्षण-प्रशिक्षण, तथा उदारीकरण करते चलना ! अथच ! सर्वात में अपने ही देश में उपेक्षित जनवादी राजभाषा हिंदी को 21वी शताब्दी की कलहंसनी बनाकर स्वदेश में देशकाल के पंखो द्वारा कालोत्तीर्ण उड़ानें देना ! सो, यह ग्रन्थ भारत एवं विश्व की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक हंसझील-नीड के मुझ जैसे सादे बन्दे का हंसगान भी है ! अगर आपको पसंद आए तो इसे एक ‘आधुनिक देह्भागवत’ भी कह लें ! तो आपकी राय का दिन-प्रतिदिन इंतजार रहेगा-ऐसे विमर्श में ! हीरामन और नील्तारा के संकल्प से !

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    Ramesh Kuntal Megh

    पचहत्तर-पार।

    स्वदेश के लगभग सोलह शहरों के वसनीक यायावर तथा विदेश के पाँच देशों (यूगोस्लाविया, इटली, सोवियत रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका) के यात्रिक।

    जाति-धर्म-प्रांत-सांप्रदायिकता से निरपेक्ष।

    संस्कारत : चित्रकार; फिर विज्ञान में बंदरछलाँग लगाई। अंतत: मार्क्सीय-सांस्कृतिक पैरामीटर पर आलोचिंतना, सौंदर्यबोधाशास्त्र, देहभाषा मिथक आलेखकारी के चतुरंग के शिल्पी-भोक्ता-रसिक-द्रष्टा।

    शिक्षा : बी.एस-सी.; एम.ए.; पी-एच.डी.।

    दीक्षा : बी.एन.एस.डी. कॉलेज, कानपुर, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी।

    अध्यापन : महाराजा कॉलेज आरा (बिहार); पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़; पंजाब यूनिवर्सिटी रीजनल सेंटर दोआबा कॉलेज, जालंधर; रीजनल सेंटर, एस.डी. कॉलेज, अंबाला कैंट; गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर; यूनिवर्सिटी ऑफ आर कंसास एट, पाईन ब्लफ, यू.एस.ए.।

    वर्तमान स्थायी ठाँव : फ्लैट सं. 3 (भू-तल) स्वास्तिक विहार, फेज-ढ्ढढ्ढढ्ढ मनसा देवी कॉम्प्लेक्स, पंचकूला-134109 (हरियाणा)।

    दूरभाष : 0172-2557312

    चलभाष : 097807-74224

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