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Media Ka Underworld

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  • Pages: 231P
  • Year: 2018, 3rd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183614214
  •  
    पेड न्यूज वर्तमान मीडिया विमर्श का सबसे चर्चित विषय है। खबरें पहले भी बिकती थीं। सरकारों और नेताओं से लेकर कम्पनियाँ और फिल्में बनाने वाले तक खबरें खरीदते रहे हैं। न्यूज के स्पेस में विज्ञापन की घुसपैठ नई नहीं है। बदलाव सिर्फ इतना है कि पहले खेल पर्दे के पीछे था, अब मीडिया अपना माल दुकान खोलकर और रेट कार्ड लगाकर बेचने लगा है। विलेन के रूप में किसी खास मीडिया हाउस को चिद्दित करना काफी नहीं है। सारा कॉरपोरेट मीडिया ही बाजार में बिकने के लिए खड़ा है। समाचार को लेकर जिस पवित्रता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी की शास्त्रीय कल्पना है, उसका विखंडन हम सब अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। मीडिया छवि बनाता और बिगाड़ता है। इस ताकत के बावजूद भारतीय मीडिया अपनी ही छवि का नाश होना नहीं रोक सका। देखते-ही-देखते पत्रकार आदरणीय नहीं रहे। लोकतंत्र का चौथा खम्भा आज धूल-धूसरित गिरा पड़ा है। मीडिया की बन्द मुट्ठी क्या खुली, एक मूर्ति टूटकर बिखर गई। यह पुस्तक इसी विखंडन को दर्ज करने की कोशिश है। देश-काल की बड़ी समस्याओं पर लिखी गई पुस्तकों में आम तौर पर समाधान की भी बात होती है। समस्या का विश्लेेषण करने के साथ ही अक्सर यह भी बताया जाता है कि समाधान का रास्ता किस ओर है। इस मायने में यह पुस्तक आपको निराश करेगी। हाल के वर्षों में जनसंचार के क्षेत्र के सबसे विवादित और चर्चित विषय पेड न्यूज को केन्द्र में रखकर लिखी गई यह पुस्तक समस्या का कोई समाधान नहीं सुझाती। पुस्तक यह समझने की कोशिश भर है कि पेड न्यूज खुद एक बीमारी है, या फिर किसी बड़ी और गम्भीर बीमारी का लक्षण मात्र। पुस्तक में मीडिया अर्थशास्त्र और व्यवसाय की समीक्षा के जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि अपनी वर्तमान संरचना की वजह से मीडिया के लिए खबरें बेचना अस्वाभाविक नहीं है। मीडिया के लिए कमाई के मुकाबले छवि की कुर्बानी कोई बड़ी कीमत नहीं है।

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    Dilip Mandal

    दिलीप मंडल पेशेवर संचारकर्मी हैं। देश के दस से अधिक प्रमुख मीडिया घरानों से लगभग दो दशक तक जुड़े रहे दिलीप मंडल वैकल्पिक मीडिया में लगातार प्रयोग कर रहे हैं। वे कॉलेज के दिनों में ही छात्र और मजदूर आन्दोलनों से जुड़े और झारखंड अलग राज्य आन्दोलन में भी शरीक रहे। पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज से हासिल किया। दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण के साथ सांस्थानिक पत्रकारिता की शुरुआत। इसके बाद जनसत्ता के कोलकाता संस्करण, इंडिया टुडे, दैनिक अमर उजाला और इंटर प्रेस सर्विस से जुड़कर प्रिंट की पत्रकारिता की। सम्पादन से लेकर चुनाव और संसदीय रिपोर्टिंग तथा प्र्रिंट माध्यम में लगभग 10 साल का सफर।

    टीवी न्यूज चैनल आज तक, जी न्यूज और स्टार न्यूज में एसोसिएट प्रोड्यूसर, असिस्टेंट एडिटर तथा सीनियर प्रोड्यूसर जैसे पदों पर रहे। देश के प्रमुख बिजनेस चैनल सीएनबीसी आवाज में एक्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर एवं टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के बिजनेस पोर्टल इकनॉमिक टाइम्स डॉट कॉम में सम्पादक रहने के दौरान कॉरपोरेट दुनिया और मीडिया कारोबार को करीब से देखने का अनुभव।

    अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण काम सांस्थानिक पत्रकारिता से बाहर रहा। मीडिया घरानों में काम करने के दौरान और उसके बाद भी विकास, विस्थापन, जनस्वास्थ्य, शिक्षा नीति और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर देश के प्रमुख समाचार पत्रों में निरन्तर लेखन। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों सम्पादकीय आलेख प्रकाशित। अनेक पुस्तकों के लिए अध्याय लिखे। पहली स्वतंत्र पुस्तक - जातिवार जनगणना: संसद, समाज और मीडिया। एक अन्य पुस्तक जातिवार जनगणना की चुनौतियाँ के सह-सम्पादक।

    पत्रकारिता प्रशिक्षण से भी जुड़े रहे। डायवर्सिटी मैन ऑफ द ईयर-2010 पुरस्कार से सम्मानित।

    सम्पर्क: dilipcmandal@gmail.com

    फोन: 09899128000

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