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Munshi Rayzada

Munshi Rayzada

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  • Pages: 664p
  • Year: 2000
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: MR206
  •  
    यह एक ऐसे अभिशप्त खानदान की गाथा है जो छ: पीढ़ियों के बाद धूल में मिल जाता है । गुमनाम हो जाता है । लेकिन फिर एक विशालकाय वटवृक्ष की भाँति खड़ा हो जाता है और अपने समय के जीते-जागते मूल्यों का निर्माण करता है । उनके लिए संघर्ष करता है और अपने मिटने के लिए समस्त साधन जुटाकर पुन: मिट जाता है । लेकिन उन्हीं के बीच से फिर कोई दूसरा मुंशी रायजादा का वंशज मूल्यों को लेकर जीने की कोशिश करता है- और धूल में दबी हुयी दूब की तरह फिर से उग आता है । मुंशी रायजादा का पूरा व्यक्तित्व लोकवार्ताओं, किंवदंतियों, आस्थाओं और विश्वासों और अवधारणाओं पर आधारित है । प्रस्तुत खानदान की गाथा का यह भाग 1773 से 1836 तक की अवधि का है । मुगल शासन टूट रहा है । फिरंगी व्यापारी देश पर छा रहे हैं । अवध क्षेत्र के पूर्वाचल में इस्तमरारी बन्दोबस्त किये जा रहे हैं । एक पुरानी पीढ़ी अवसाद भरी वेदना के साथ सब कुछ खो रही है । पुराने सामंत अपमानित हो रहे हैं । उनकी जागीरें छीनी जा रही हैं । सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है, लेकिन उसी में से एक शाखा ऐसी भी पनपती है जो लुटेरों से समझौता कर लेती है । संयुक्त परिवार टूट रहे हैं । ग्रामीण अर्थव्यवस्था बिखरती है । जगह-जगह राजनैतिक एजेंट नियुक्त हो रहे हें । एक ओर टूटने और बिखरने का दर्द है ओर अनिश्चित भविष्य के संत्रास में पूरा समाज डूबा है । भगवतीचरण, रामचरण की यह कथा उसी कानून के आधार पर बनी है जो अवध के नवाबों के सम्भाले नहीं संभाली और एक आलीशान ढांचे के समान इतिहास के गर्त में लीन हो गयी । यह पुस्तक इतनी रोचक है कि प्रत्येक पाठक इसे अपने ही पूर्वजों की गाथा समझेगा ।

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    Laxmikant Verma


    लक्ष्मीकान्त वर्मा
    जन्म : 15 फरवरी, 1922 स्वतंत्र लेखन; साहित्य की सभी विधाओं में समान रुचि, समीक्षा, आलोचना के क्षेत्र में नये मूल्यों के अन्वेषी किन्तु मुख्यत: कवि और सृजनशील साहित्य के प्रति आस्थावान । लगभग 30 पुस्तकें छप चुकी हैं । पत्रकारिता में भी दखल, कई पत्रों का सम्पादन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विशेष स्तम्भों कै लेखक । भूतपूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, हिन्दी संस्थान, उत्तर-प्रदेश ।
    सरयू कुटीर, मधवापुर, इलाहाबाद ।

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