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Naari

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  • Pages: 152p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312076
  •  
    चिरन्तन नारी युग-युग के अन्धकार में, उसे तुच्छ करके चिरकाल से आगे बढती जा रही है, दुख और विपत्ति के अंधियारे पथ को पद दलित करती हुई ! उसे कोई भय नहीं है, कोई चिंता नहीं है ! यही वह भाव है, यही वह मूल-मंत्र है, जिसके इर्द-गिर्द सशक्त उपन्यासकार सियारामशरण गुप्त जी ने इस उपन्यास का ताना-बाना बुना है, जो रोचक है, उत्कृष्ट मनोरंजन प्रदान करने वाला है, और दिशाहीन होते समाज को सही दिशा दिखाने वाला भी है ! नारी सहित प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की सृष्टि है ! इसी कारण ईश्वर की तरह वह गहन भी है ! ईश्वर की तरह ही कष्ट सहन करके ही उसे ईश्वरीय शक्ति उपलब्ध करना होगा ! उचित यही है, करणीय यही है ! यही वह मान्यता है, यही वह सिद्धांत है, जिसे इस उपन्यास में निरुपित किया गया है, स्थापित किया गया है ! उपन्यास के पात्र जैसे सजीव हो कर इन सर्वोच्च मान्यताओं को अपने क्रिया-कलापों और संवादों से इस प्रकार पूर्णता से स्थापित करते चलते हैं कि पाठक के मन-मस्तिष्क पर उसका स्थाई प्रभाव पड़े !

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    Siyaramsharan Gupt


    श्री सियारामशरण गुप्त
    जन्म : 1895, चिरगाँव, झांसी, उत्तर प्रदेश देहावसान : 29 मार्च, 1963
    श्री सियारामशरण गुप्त राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे । कवि, कथाकार और निबन्ध लेखक के रूप में उन्होंने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था । उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: -
    काव्य : मौर्य-विजय, अनाथ, दूर्वाद्रल, विषाद, आर्द्रा, आत्मोत्सर्ग, पाथेय, मृणमयी, बापू उलूक, दैनिकी, नकुल, नोआखली में, जयहिन्द, गीता-संवाद, गोपिका, अमृत-पुत्र । उपन्यास-गोद, अंतिम आकांक्षा, नारी ।
    कहानीसंग्रह - मानुषी ।
    निबन्ध संग्रह - झूठ-सच ।
    नाटक - पुण्य पर्व ।
    श्री सियारामशरण गुप्त की रचनाओं में उनके व्यक्तित्व की सरलता, विनयशीलता, सात्विकता और करुणा सर्वत्र प्रतिफलित हुई है । वास्तव में गुप्त जी मानवीय संस्कृति के साहित्यकार हैं । उनकी रचनाएं सर्वत्र एक प्रकार के चिन्तन, आस्था-विश्वासों से भरी हैं, जो उनकी अपनी साधना और गांधी जी के साध्य साधन की पवित्रता की गूंज से ओत-प्रोत हैं ।

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