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  • Pages: 195p
  • Year: 2009
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183612920
  •  
    आप विश्वास करें या न करें, लेकिन है यह हकीकत। एक बालक अनाथाश्रम में जन्मा, पला और बड़ा हुआ। उसके माँ-बाप, रिश्तेदार कोई नहीं थे। उसका जाति-धर्म, वंश, गोत्र कुछ नहीं था। सिर्फ था एक नम्बर, जैसे कारावास में कैदी का होता है। वह ‘नेम नॉट नोन’ था। प्रश्नों से घिरी उसकी जिन्दगी में प्रश्नों ने ही उसे पाला-पोसा। प्रश्नों ने ही उसे वयस्क बनाया, समझदार बनाया। आज वह एक ‘वेलनोन’ सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, समीक्षक, वक्ता, अनुवादक, सम्पादक और प्राचार्य के रूप में सुविख्यात है। एक सामाजिक ‘आयडॉल’ बना है। प्रस्तुत पुस्तक ‘नेम नॉट नोन’ सुनीलकुमार लवटे की आत्मकथा है। सबकुछ होने पर भी कुछ न करने वालों को यह आत्मकथा न सिर्फ सक्रिय करती है अपितु सोचने को भी प्रेरित करती है कि आखिर मनुष्य में वह कौन-सा रसायन होता है जो उसे सारी प्रतिकूलताओं को परास्त करने की ऊर्जा देता है, जीते-जी मृत्युंजय बनाता है ! नेम नॉट नोन आप विश्वास करें या न करें, लेकिन है यह हकीकत। एक बालक अनाथाश्रम में जन्मा, पला और बड़ा हुआ। उसके माँ-बाप, रिश्तेदार कोई नहीं थे। उसका जाति-धर्म, वंश, गोत्र कुछ नहीं था। सिर्फ था एक नम्बर, जैसे कारावास में कैदी का होता है। वह ‘नेम नॉट नोन’ था। प्रश्नों से घिरी उसकी जिन्दगी में प्रश्नों ने ही उसे पाला-पोसा। प्रश्नों ने ही उसे वयस्क बनाया, समझदार बनाया। आज वह एक ‘वेलनोन’ सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, समीक्षक, वक्ता, अनुवादक, सम्पादक और प्राचार्य के रूप में सुविख्यात है। एक सामाजिक ‘आयडॉल’ बना है। प्रस्तुत पुस्तक ‘नेम नॉट नोन’ सुनीलकुमार लवटे की आत्मकथा है। सबकुछ होने पर भी कुछ न करने वालों को यह आत्मकथा न सिर्फ सक्रिय करती है अपितु सोचने को भी प्रेरित करती है कि आखिर मनुष्य में वह कौन-सा रसायन होता है जो उसे सारी प्रतिकूलताओं को परास्त करने की ऊर्जा देता है, जीते-जी मृत्युंजय बनाता है !

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    Dr. Sunil kumar Lavte

    महाराष्ट्र राज्य में अनाथों के संगोपन एवं पुनर्वास कार्यकर्ता के रूप में सुविख्यात।

    शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी.

    रचनाएँ: हिन्दी में नाटककार शंकर शेष (1982), यशपाल: एक समग्र मूल्यांकन (1984) तथा शेवडे: व्यक्तित्व एवंकृतित्व (1986) जैसे समीक्षा ग्रन्थ बहुचर्चित एवं पुरस्कृत। मराठी एवं हिन्दी में मौलिक लेखन के साथ अनुवाद, समीक्षा, सम्पादन एवं अनुसंधान कार्य।

    फिलहाल वि.स. खांडेकर के समग्र साहित्य सम्पादन प्रकल्प में व्यस्त।

    विदेश-यात्रा: यूरोप एवं एशिया के अनेक देशों का भारतीय शिष्टमंडल के साथ भ्रमण एवं अध्ययन।

    पुरस्कार: हिन्दी सेवा के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार तथा हिन्दी साहित्य अकादमी, महाराष्ट्र सरकार द्वारा गौरव।

    प्रस्तुत अनुवाद की मूल आत्मकथा ‘नीचे धरा, ऊपर गगन’ को महाराष्ट्र सरकार, महाराष्ट्र फाउंडेशन, अमेरिका का श्रेष्ठ ग्रन्थ पुरस्कार।

    प्रस्तुत रचना का गुजराती एवं ब्रेल में अनुवाद। अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में अन्तर्भूत।

    इस आत्मकथा का रेडियो से प्रसारण भी हो चुका है।

    सम्प्रति: महावीर महाविद्यालय, कोल्हापुर (महा.) के प्राचार्य।

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