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Naye Pratiman : Purane Nikash

Naye Pratiman : Purane Nikash

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  • Pages: 193p
  • Year: 1996
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: NPPN214
  •  
    पिछले तीस वर्षो से जिस एक समस्या को हमारे हिन्दी के आलोचक-विचारक और चिन्तक जान-बूझकर टालते आ रहे हैं वह नये साहित्य के मूल्यांकन और उसको परखने के लिए उचित प्रतिमानों की धारणा है । आज भी बहुत-से ऐसे लोग हैं जो यह चाहते हैं कि मध्ययुगीन आदर्शो, नियमों और शास्त्रों के आधार पर ही नये साहित्य की व्याख्या की जाये । इस दिशा में सबसे बड़े पराक्रमी महारथी अपनी समस्त प्रतिभा का दुरुपयोग करने के साथ-साथ नये साहित्य के मूल्यांकन के प्रति भी अन्याय ही कर रहे हैं । वह शायद यह भूल जाते ई कि किसी भी भाषा का व्याकरण भाषा के विकास के साथ बदलता रहता है, किसी भी जीवित साहित्य का साहित्य शास्त्र भी साहित्य के विकास के साथ-साथ बदलता रहता है । यह बदलने की प्रक्रिया स्वस्थ, गतिशील, जीवन्त एवं जागरूक चेतना की परिचायक है ।. ... किसी भी साहित्यिक प्रवृत्ति के मूल्यांकन के लिए तीस वर्ष की अवधि पर्याप्त होनी चाहिए । विभिन्न प्रवृतियों के माध्यम से आज का नया भाव-बोध इन बीस वर्षो में व्यक्त होता आ रहा है । यदि इन तीस वर्षो में प्राचीन काव्यशास्त्र द्वारा इस तीस वर्ष के साहित्यिक कृतित्व का मूल्यांकन नहीं हो सका तो यह आवश्यक है कि इस अन्तराल की साहित्यिक प्रवृत्तियों में निहित मूल्यों की विवेचना और उनकी सौन्दर्यात्मक उपलब्धियों के विश्लेषण का शास्त्र इन्हीं के कथ्य साहित्य से निर्मित किया जाए । आज के सन्दर्भ में यह अनिवार्य तो है ही, साथ ही यह उचित भी होगा । ....

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    Laxmikant Verma


    लक्ष्मीकान्त वर्मा
    जन्म : 15 फरवरी, 1922 स्वतंत्र लेखन; साहित्य की सभी विधाओं में समान रुचि, समीक्षा, आलोचना के क्षेत्र में नये मूल्यों के अन्वेषी किन्तु मुख्यत: कवि और सृजनशील साहित्य के प्रति आस्थावान । लगभग 30 पुस्तकें छप चुकी हैं । पत्रकारिता में भी दखल, कई पत्रों का सम्पादन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विशेष स्तम्भों कै लेखक । भूतपूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, हिन्दी संस्थान, उत्तर-प्रदेश ।
    सरयू कुटीर, मधवापुर, इलाहाबाद ।

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