• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Naye Sahitya Ka Saundarya Shastra

Naye Sahitya Ka Saundarya Shastra

Availability: Out of stock

Regular Price: Rs. 200

Special Price Rs. 180

10%

  • Pages: 189p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171190917
  •  
    हिन्दी कविता की धारा में गजानन माधव मुक्तिबोध का हस्तक्षेप जितना निर्णायक रहा, उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका आलोचना के पैमानों को तय करने में भी उनकी रही। ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ में संकलित आलेखों से आगे के आलोचकों को न सिर्फ कविता और साहित्य को समझने की दृष्टि प्राप्त हुई, बल्कि कवियों और रचनाकारों को भी मुक्तिबोध के चिंतन से एक नया ‘विज़न’ मिला। ‘जनता का साहित्य किसे कहते हैं?’ शीर्षक आलेख में मुक्तिबोध जनधर्मी साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं: ‘ ‘जनता का साहित्य’ का अर्थ जनता को तुरंत ही समझ में आनेवाले साहित्य से हरगिज नहीं। अगर ऐसा होता तो किस्सा तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते। साहित्य के अंदर सांस्कृतिक भाव होते हैं। सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए बुलंदी, बारीकी और खूबसूरती को पहचानने के लिए, उस असलियत को पाने के लिए जिसका नक्शा साहित्य में रहता है, सुनने या पढ़नेवाले की कुछ स्थिति अपेक्षित होती है। वह स्थिति है उनकी शिक्षा, उनके मन का परिष्कार।...‘जनता का साहित्य’ का अर्थ ‘जनता के लिए साहित्य’ से हैैै।...ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन-मूल्यों को, जनता के जीवनादर्शों को प्रतिष्ठापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो।’ इसी प्रकार साहित्य, साहित्य की प्रासंगिकता, रचना-प्रक्रिया, प्रयोगवादी और नई कविता की प्रकृति, रचना की आवश्यकता और साहित्य के मार्क्सवादी पहलू पर मुक्तिबोध ने नितांत मौलिक और वस्तुनिष्ठ नजरिये से विचार किया है।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Gajanan Madhav Muktibodh

    गजानन माधव मुक्तिबोध

    आपका जन्म 13 नवम्बर, 1917 को श्योपुर, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ। आपने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी से एम.ए. तक की पढ़ाई की।

    आजीविका के लिए 20 वर्ष की उम्र से बडऩगर मिडिल स्कूल में मास्टरी आरम्भ करके दौलतगंज (उज्जैन), शुजालपुर, इन्दौर, कलकत्ता, बम्बई, बंगलौर, बनारस, जबलपुर, नागपुर में थोड़े-थोड़े अरसे रहे। अन्तत: 1958 में दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगाँव में।

    आप लेखन में ही नहीं, जीवन में भी प्रगतिशील सोच के पक्षधर रहे, और यही कारण कि माता-पिता की असहमति के बावजूद प्रेम विवाह किया।

    अध्ययन-अध्यापन के साथ पत्रकारिता में भी आपकी गहरी रुचि रही। ‘वसुधा’, ‘नया खून’ जैसी पत्रिकाओं में सम्पादन-सहयोग। आप अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तार सप्तक’ के पहले कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। प्रगतिशील कविता और नई कविता के बीच आपकी कलम की भूमिका अहम और अविस्मरणीय रही जिसका महत्त्व अपने ‘विज़न’ में आज भी एक बड़ी लीक।

    आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक-धूल, प्रतिनिधि कविताएँ (कविता); काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी (कहानी); कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म-संघर्ष, नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र (जिसका नया संस्करण अब कुछ परिवर्तित रूप में ‘आखिर रचना क्यों?’ नाम से प्रकाशित), समीक्षा की समस्याएँ,  एक साहित्यिक की डायरी (आलोचना); भारत : इतिहास और संस्कृति (विमर्श); मेरे युवजन मेरे परिजन (पत्र-साहित्य); शेष-अशेष (असंकलित रचनाएँ)। आपकी प्रकाशित-अप्रकाशित सभी रचनाएँ मुक्तिबोध समग्र में शामिल जो आठ खंडों में प्रकाशित।

    निधन : 11 सितम्बर, 1964 को नई दिल्ली में हुआ।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144