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Nind Thi Aur Raat Thi

Nind Thi Aur Raat Thi

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  • Pages: 142p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171199925
  •  
    नींद थी और रात थी’ की कविताओं में एक स्तर पर जहाँ सविता सिंह के उन सरोकारों और विश्व–दृष्टि की निरन्तरता है जिनके कारण पिछले संग्रह ‘अपने जैसा जीवन’ को विपुल सराहना मिली, तो अन्य स्तरों पर उस अनूठे और स्वाभाविक विकास की अद्भुत छवियाँ भी हैं जिसकी जड़ें हमारे संश्लिष्ट यथार्थ में बसती हैं । पिछली सदी के नवें दशक में काव्य– सक्रियता की शुरुआत करनेवाली सविता सिंह की रचनाओं ने स्त्री विमर्श के गहरे आशयों से संयुक्त सांस्कृतिक बोध के लिए हमारी भाषा में नयी जगह बनायी है और हिन्दी कविता के समकालीन सौन्दर्यशास्त्र को सम्भावना के नए इलाक’ों में पहुँचाया है, यह कहना अतिकथन नहीं लगता क्योंकि न्याय, शक्ति और क्षमता के लिए संघर्ष करनेवाली नयी स्त्री के अनुभवों, स्वप्नों और सामर्थ्य से पूर्ण होती ये कविताएँ न सिफर्’ नयी उम्मीदों की तरफ’ जाती हैं बल्कि एक प्रकार की सामाजिक–सांस्कृतिक क्षतिपूर्ति का भरोसा भी दिलाती हैं । ‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में आकुल यथार्थ और स्वप्नमयता का द्वंद्व है जिसकी गतिमानता हमारे समय के मानवीय मूल्यों वाले यथार्थ को विकृत करनेवाली या कि उसके रूपों को /ाुँ/ाला करनेवाली ताक’तों के ख़िलाफ’ बड़ी साव/ाानी से अपना काम करती है । ये कविताएँ काफ’ी कुछ तोड़ती हैं, लेकिन तोड़ने के पश्चात या कई बार ज“रूरत होने पर उसके साथ–साथ ही, रचती भी चलती हैं । इस दुहरी जि“म्मेदारी वाली सक्रियता के ज“रिए सविता सिंह की कविताएँ हिन्दी जाति के सामूहिक मन का, उस मन के मर्म का, पुनर्संस्कार करती हैंµआत्मविश्वास से दीप्त विनम्रता के साथ, जिसमें दृष्टि की सफ’ाई और उद्देश्य की दृढ़ता प्रभुतावादी सत्ताओं के वर्चस्व को ही नहीं, कई बार उनके छल भरे उदार–भाव को भी नेस्तनाबूद करने पर आमादा दीखती हैं । ‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में पीड़ा और अवसाद का भाव भी दम तोड़ता आख़िरी अहसास नहीं है बल्कि अपने आवेग–संवेग से हमें आत्मा के उस सूने में ले जाता है जहाँ शायद हम कभी गये न थे और सच के वे बिम्ब पाये न थे जो अचानक ख्”ाुद को वहाँ प्रकट करने लगते हैं । इन कविताओं में प्रकृति, समय के स्त्रीकरण और ऐसी ही अन्य प्रवि/िायों के मा/यम से अपने ‘आत्मचेतस आत्मन’ के आविष्कार की कोशिश है । ‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में स्त्री–विमर्श की तर्कशीलता का काव्यात्मक आभ्यंतर, स्त्री–अस्मिता की पीड़ा, उदग्र ऐन्द्रीयता, सान्द्रता और संघर्ष सहजता की जिस ज“मीन पर उजागर हुए हैं वह सचमुच नयी खोज और आश्वस्ति की ज“मीन है ।

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    Savita Singh

    जन्म: फरवरी 1962 आरा (बिहार)।

    शिक्षा: राजनीतिशास्त्र में एम.ए., एम.फिल., पी-एच.डी. (दिल्ली विश्वविद्यालय)। मांट्रियाल (कनाडा) स्थित मैक्गिल विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्ष तक शोध व अध्यापन। शोध का विषय: ‘भारत में आधुनिकता का विमर्श’।

    सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अध्यापन का आरम्भ करके डेढ़ दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। सम्प्रति इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर, स्कूल ऑव जे़न्डर एंड डेवलेपमेंट स्टडीज़ की संस्थापक निदेशक रहीं।

    हिन्दी व अंग्रेज़ी में सामाजिक-राजनीतिक परि: श्य, स्त्री-विमर्श और अन्य वैचारिक मुद्दों पर निरन्तर लेखन। अनेक शोध पत्र और कविताएँ अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पहला कविता संग्रह ‘अपने जैसा जीवन’ (2001) हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत। दूसरे कविता संग्रह ‘नींद थी और रात थी’ (2005) पर रज़ा सम्मान। दो द्विभाषिक काव्य संग्रह ‘रोविंग टुगेदर’ (अंग्रेज़ी-हिन्दी) तथा ‘ज़ स्वी ला मेजों दे जेत्वाल (फ्रेंच-हिन्दी) 2008 में प्रकाशित। अंग्रेज़ी में कवयित्रियों के अन्तर्राष्ट्रीय चयन ‘सेवेन लीव्स, वन ऑटम’ (2011) का सम्पादन जिसमें प्रतिनिधि कविताएँ शामिल। 2012 में प्रतिनिधि कविताओं का चयन ‘पचास कविताएँ: नयी सदी के लिए चयन’ शृंखला में प्रकाशित। फाउंडेशन ऑव सार्क राइटर्स ऐंड लिटरेचर के मुखपत्र ‘बियांड बोर्डर्स’ का अतिथि सम्पादन।

    कनाडा में रिहाइश के बाद दो वर्ष का ब्रिटेन प्रवास। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलैंड और मध्यपूर्व तथा अफ्रीका के देशों की यात्राएँ जिस दौरान विशेष व्याख्यान दिये।

    सम्पर्क: 28/604, ईस्टएंड अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, फेज-1 एक्सटेंशन, दिल्ली-110096

    मो.: 0919911401974

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