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Nirala Ke Srajan Simant

Nirala Ke Srajan Simant

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  • Pages: 250p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8183610110
  •  
    इस किताब की प्रमुख कोशिश निराला को उनकी अपनी भूमि पर देखने और समझने की है, इस आस्था के साथ कि यह अपने आप को भी समझने की शुरुआत है, अपनी परंपरा और अपनी परंपरा की आधुनिकता को। जिस दुनिया में खड़े होकर आज हम निराला की परंपरागत आधुनिकता को देखते हैं वह उनकी मूल्यचेतना की सार्थकता और प्रासंगिकता की गवाही स्वयं देती है। जिसे वे जड़वादी दृष्टि कहते थे उसकी यात्रा की दिशा को वे दूर तक देख और समझ सकते थे। उसके विपक्ष में वे आत्मवाद के साथ खड़े थे तो इसलिए कि वे मानते थे कि अनियंत्रित उपभोग की वह जड़वादी दिशा ही विनाश की है। ‘कुकुरमुत्ता’ में निराला ने कुकुरमुत्ता के खात्मे से उसी अंत की ओर, तथा ‘खजोहरा’ में अपनी ही खुजली से कूदती, फाँदती, भगाई मचाती जड़वादी दृष्टि यानी माया की उपचारहीन जलन की ओर इशारा किया है। अब उनकी सार्थकता और प्रासंगिकता के बार-बार आविष्कार का समय है। उस दिशा में यह छोटी-सी कोशिश उनकी कविताओं में व्यक्त संसार को मूल रूप से उनके अपने ही निबंधों, कहानियों, समीक्षाओं आदि में निहित विचारों के सहारे सत्यापित करने की है क्योंकि इससे एक तो उनका अपना मंतव्य प्रमाणित होता है, दूसरे, आधुनिक आलोचना के पास निराला को जाँचने के लिए ‘अंतर्विरोध’ के अलावा और कोई अवधारणा न होने के कारण, और उस अवधारणा से मूलतः असहमत होने के कारण लेखिका के पास और कोई उपयुक्त कसौटी नहीं बचती।

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    Archana Verma

    कवि, कथाकार और समीक्षक।

    पहली कहानी सन् 1966 ‘धर्मयुग’ दीपावली विशेषांक में। तब से अब तक सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

    उपन्यास: मास्टर दा।

    कहानी-संग्रह: स्थगित (अब अप्राप्य)।

    कविता-संग्रह: कुछ दूर तक, लौटा है विजेता।

    विशेष अध्ययन के क्षेत्र: सृजन प्रक्रिया और काव्य भाषा, निराला, अस्तित्ववाद और हिंदी साहित्य।

    सम्प्रति: मिराण्डा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से सम्बद्ध। ‘हंस’ में संपादन सहयोग।

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