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  • Pages: 169
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126730001
  •  
    ब्रांड यानी उत्पाद विशेष का नाम...एक ट्रेडमार्क वेबस्टर्स शब्दावली के अनुसार ब्रांड यानी....A mark burned on the skin with hot iron. हिंदी में इसका भावार्थ है : व्यक्ति के शरीर पर उसकी पहचान दाग देना यही इस पुस्तक का सार है ! ब्रांड किसी उत्पाद का केवल नाम ही नहीं होता ! उसके उत्पाद का पैटेंटेड ट्रेडमार्क भी नहीं होना ! ग्राहक जब ब्रांडेड उत्पाद खरीदता है तो वह इस विशवास का मूल्य भी चुकाता है कि उत्पाद गुणवत्तायुक्त होगा, झंझटमुक्त लम्बी सेवा प्रदान करेगा और उसे वादे के अनुसार बिक्री बाद सेवा मिलेगी ! दूसरे शब्दों में ब्रांडेड उत्पादों के निर्माता केवल वस्तु का मूल्य प्राप्त नहीं करते ! वे एक भरोसे, एक विश्वास कि कीमत भी वसूल करते हैं ! वही ब्रांड लम्बी पारी खेलते हैं, जो अपने पर 'दाग' दी गई 'पहचान' को एक बार नहीं, बार-बार भी नहीं, बल्कि हर बार सही साबित करते हैं ! ऐसे ही शतकीय पारी के बाद ग्लोबल मार्किट में आज भी अव्वल 25 ग्लोबल ब्रांड का इतिहास इस पुस्तक में संजोया गया है !

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    Prakash Biyani

    किशोरावस्था से सतत् लेखन कर रहे प्रकाश बियाणी मूलत: बैंकर हैं। भारतीय स्टेट बैंक में 25 साल (1968-1995) नौकरी करने के बाद वे आठ साल देश के अग्रणी समाचार पत्र समूह 'दैनिक भास्कर’ में कार्पोरेट संपादक रहे हैं। देश के औद्योगिक परिदृश्य व उद्योगपतियों पर उनके दो हजार से ज्यादा लेख/साक्षात्कार/समीक्षाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। इस दौरान उन्हें देश के कई अग्रणी उद्योगपतियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुअवसर भी मिला है एवं राष्टï्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बिजनेस मीट/ इवेंट्स में शिरकत करने का मौका भी। इन दिनों वे कार्पोरेट जगत व कंपनी मामलों पर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। आपकी पुस्तक 'शून्य से शिखर’ (35 भारतीय उद्योगपतियों की यशोगाथा) को पाठकों खासकर बिजनेस स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। अपने किस्म की इस अनूठी पुस्तक का द्वितीय संशोधित संस्करण एवं पेपरबैक संस्करण भी एक साल में मार्केट में लांच हो चुके हैं।

    'जो समाज धनोपार्जन करने वाले लोगों को कोसता है वह दरिद्रता में जीता है’ - स्व. धीरूभाई अंबानी के इस कथन से सहमत होते हुए

    श्री बियाणी का मत है कि राष्टï्रीय संपदा का समाज के हर वर्ग में न्यायोचित वितरण होना चाहिए। वे मानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के ताजा दौर में केवल सर्वश्रेष्ठï ही बचेंगे पर शिक्षित व अशिक्षित अथवा कुशल व अकुशल हर शख्स को रोजगार के अवसर मिलना चाहिए। तद्नुसार यदि अब कोई चूक न हुई तो उदारीकरण व आर्थिक सुधार कार्यक्रम का दूसरा दौर देश के हर वर्ग को उनके वाजिब हक दिलवाएगा। इतिहास से सबक लेने की मंशा से लिखी गई है यह पुस्तक : 'जी, वित्तमंत्रीजी!’

    सम्पर्क : (०७३१) २५६०७७७, ०९३०३२२३९२८

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