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Panchhi Aise Aate Hai

Panchhi Aise Aate Hai

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  • Pages: 112
  • Year: 2013, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180315626
  •  
    विजय तेंडुलकर की मूल मराठी नाटक कृति 'अशी पाखरे यती' का यह हिंदी अनुवाद अब पूरे देश की नाट्य सम्पदा का महत्तपूर्ण अंश है ! जहाँ भी रंगमंच जिवंत है, वहां यह नाटक लगातार खेला जा रहा है ! कितने ही नगरों मेन दर्शकों की माँग पर इस नाटक के अनेकानेक प्रदर्शन हुए हैं जो कृति के समग्र प्रभाव का आकलन तो करते ही हैं-लोकरूचि के स्वस्थ परिवार की भी सूचना देते हैं ! नाटक में तमाम शिल्पगत विशेषताएं भरी हुई हैं ! सबसे अचरज की बात यह है कि यह नाटक साधारण दर्शक से लेकर सुरुचि संपन्न अभिजात्य बौद्धिक वर्ग को भी तीन घंटे तक अपने अन्दर बांधे रहता है ! इस अर्थ में यह कृति सचमुच नाट्य जगत की अभूतपूर्व घटना है-जैसा कि भारतीय पत्र-पत्रिकाओं ने इसके बारे में एक स्वर से घोषणा की है ! इस नाटक ने हर स्तर के दर्शकों को बरबस आकर्षित और अभिभूत किया है ! अपने भीतर प्रवाहित करुणा की धारा को संपुन्जित किये हुए दर्शकों को यह नाटक हँसाता चलता है ! यह इस नाटककार की अपनी विशेषता है !

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    Vijay Tendulkar

    विजय तेन्दुलकर

    जन्म : 6 जनवरी, 1928 । मराठी के आधुनिक नाटककारों में शीर्षस्थ विजय तेन्दुलकर अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठित एक महत्त्वपूर्ण नाटककार थे । 50 से अधिक नाटकों के रचयिता तेन्दुलकर ने अपने कथ्य और शिल्प की नवीनता से निर्देशकों और दर्शकों, दोनों को बराबर आकर्षित किया । पूरे देश में उनके नाटकों के अनुवाद एवं मंचन हो चुके हैं । हिन्दी में उनके 30 से अधिक नाटक खेले जा चुके हैं ।

    ‘खामोश ! अदालत जारी है’, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘जाति ही पूछो साधु की’ और ‘गिद्ध’ आदि बहुचर्चित-बहुमंचित नाटकों के अलावा उनकी प्रमुख नाट्य रचनाएँ हैं: ‘अंजी’, ‘अमीर’, ‘कन्यादान’, ‘कमला’, ‘चार दिन’, ‘नया आदमी’, ‘बेबी’, ‘मीता की कहानी’, ‘राजा माँगे पसीना’, ‘सफ़र’, ‘नया आदमी’, ‘हत्तेरी किस्मत’, ‘आह’, ‘दंभद्वीप’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’, ‘काग विद्यालय’, ‘काग़ज़ी कारतूस’, ‘नोटिस’, ‘पटेल की बेटी का ब्याह’, ‘पसीना-पसीना’, ‘महंगासुर का वध’, ‘मैं जीता मैं हारा’, ‘कुत्ते’, ‘श्रीमंत’, 'विठ्ठला' आदि।

    विजय तेन्दुलकर के नाटकों में मानव जीवन की विषमताओं, स्वाभाविक व अस्वाभाविक यौन सम्बन्धों, जातिगत भेदभाव और हिंसा का यथार्थ चित्रण मिलता है । उनके अधिकांश पात्र मध्यम एवं निम्न मध्यमवर्ग के होते हैं और उनके विभिन्न रंग इन नाटकों में आते हैं ।

    निधन : 19 मई, 2008

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