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Peeth Pichhe Ka Aangan

Peeth Pichhe Ka Aangan

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  • Pages: 120
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388753869
  •  
    'पीठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा | पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो | पहले वाक्य ने ही मुझे जकड लिया: 'अन्तहीन काली ऊन' | अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो | मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो | जाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ | पहले उपन्यास (अँधेरी खिड़कियाँ) में जो संभावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं | सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो-और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन संभव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है-साधारण यथार्थ के बगैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया | --कृष्ण बलदेव वैद सड़क किसी लम्बी चटाई की तरह फैलने के बाद सिमटती जा रही थी | थकी-हारी | दोनों घरों को लपेटती | किसी गठरी की तरह | आधी बंधी आधी खुली | उसने कभी किसी घर में झाँका नहीं | दोनों घरों से आती आवाजों से वह कयास लगा लेती कि भीतर क्या चल रहा है | कौन चल रहा है | कौन भटक गया है | कौन ढूंढ रहा है, कौन गुम हो गया | भीतर के इन्तजार से धकियाता कभी-कभार कोई घर से बाहर निकलता और इधर-उधर बदहवास भटकने लगता | इस घर से उस घर, उस घर से इस घर | सड़क किसी का घर नहीं थी | उसके पास ज्यादा देर वही रहता जिसे कहीं छिपना हो या जो पराया हो-अकेला हो | न आगे न पीछे कोई हो | रात को सड़क अपने अंग कस लेती | समेट लेती | चौकन्नी हो जाती | जो कुछ भी घटता था वह रात में ही घटता था | किसी का आना किसी का जाना | किसी का पुकारना किसी का दस्तक देना | किसी का लौटना किसी का गुम हो जाना | किसी का सर टकराना किसी का पीठ खुजलाना किसी का हँसाना किसी का सिसकना किसी का गूंगा हो जाना किसी का नींद में चलना किसी का सपने में खो जाना किसी का नींद में मर जाना किसी का बार-बार दरवाजे की और लपकना किसी का अनवरत चिट्ठी लिखना किसी का रोज मेकअप करना किसी का रोज पता खो जाना किसी की भूमिका ऐन वक्त पर बदल जाना किसी का जीवन-भर दरवाजे के सहारे बैठे एक ही नाटक देखना किसी का अंतहीन हैलो कहना किसी को अंतहीन रिंग सुनाई पड़ना...| दिन में क्या होता था सिवाय इसके कि जो खो गया है वह और खो जाए जो विस्मृत है वह और दूर चला जाए | सड़क हर बार हर रात खुद को आखिरी पहर यूँ समेटती जैसे अब यह आखिरी रात है फिर न दिन है न रात ओर है न छोर |

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    Anirudh Umat

    अनिरुद्ध उमट

    28 अगस्त, 1964 को बीकानेर में जन्मे अनिरुद्ध उमट के अब तक दो उपन्यास, दो कविता-संग्रह, एक कहानी-संग्रह एवं एक निबंध-संग्रह प्रकाशित हैं। राजस्थानी कवि वासु आचार्य के साहित्य अकादमी से सम्मानित कविता-संग्रह ‘सीर रो घर’ का हिंदी में अनुवाद | ‘अँधेरी खिड़कियाँ’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर का ‘रांगेय राघव स्मृति सम्मान | संस्कृति विभाग (भारत सरकार) की ‘जूनियर फेलोशिप’ तथा ‘कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप’ प्रदत्त |

    संपर्क: राजकीय मुद्रणालय के समीप, बीकानेर - 334 001 (राजस्थान)।

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