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Poorvapar

Poorvapar

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  • Pages: 268p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171780814
  •  
    सांसारिकता से पलायन और सांसारिकता का स्वीकार - भारतीय मन सहस्राब्दियों से इन दोनों जीवन मूल्यों के बीच झूलता आ रहा है । दुनिया से भागने, उसे त्यागने में जो एक आत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा है, परंपरित विश्वासों और संस्कारों के निर्वाह का जो गर्व है, उसी की उपज होते हैं बंसी उर्फ बाबाजी -जैसे चरित्र, जो इस उपन्यास का नायक है और जिसे सुपरिचित कवि-कथाकार रमेशचंद्र शाह ने पूरी सजगता से रचा है । लेखक की यह सजगता इस बात में भी है कि एक कठिन विषय को उसने अत्यंत सहज भाषा- शिल्प में प्रस्तुत किया है और इस कौशल में भी कि उसका कथानायक अपनी समूची द्वंद्वयात्रा में अपने ही बालसखा बंटी के शब्द -साक्ष्य से उद्वेलित और उत्प्रेरित है । लगता है जैसे वह उसी का दूसरा प्रतिरूप हो; यानी वह प्रतिरूप जिसे वह अपने ही किए जी नहीं पाया और जो अब उसकी अंतर्विभक्त अवस् था, उसके राग - विराग, विश्वास - अविश्वास और आशा- निराशा को निर्ममता से विश्लेषित कर रहा है । यही कारण है कि जब बंटी एक कृति के बहाने एक आत्मीय स्मृति की तरह बंसी को छू जाता है तो जैसे उसकी समूची सा धना- भूमि डोल उठती है । वह सब जो उसके लिए मर चुका था, फिर से जीवित हो उठा और उसकी प्रत्येक निषिद्ध और दमित चित्तवृत्ति उसे प्रश्नाकुल करने लगी । उसकी यह प्रश्नाकुलता ही इस उपन्यास का मूला धार है, जिससे भारतीय धर्म -दर्शन के कितने ही अनुत्तरित पहलू उजागर होते हैं । संक्षेप में कहें तो 'शाह की यह महत्त्वपूर्ण कथाकृति मनुष्य के उस वैयक्तिक सुखवाद का तात्त्विक चित्रण करती. है, जिसके मूल में सांसारिकता की उपेक्षा का अतार्किक दर्शन निहित है ।

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    Ramesh Chandra Shah

    जन्म : वैशाखी त्रयोदशी, 1937 अल्मोड़ा, उत्तरप्रदेश।

    शिक्षा : अल्मोड़ा  तथा  प्रयाग विश्वविद्यालय में।

    प्रकाशित कृतित्व—काव्य : कछुए की पीठ पर, हरिश्चन्द्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुन्द को, चाक पर समय तथा देखते हैं शब्द भी अपना समय के अतिरिक्त तीन बाल कविता-संग्रह। उपन्यास : गोबरगणेश, कि़स्सा ग़ुलाम, पूर्वापर, आखि़री दिन, पुनर्वास। छठा उपन्यास 'विभूतिबाबू की आत्मकथा’ शीघ्र प्रकाश्य। 'कि़स्सा ग़ुलाम’ आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। कहानी-संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, प्रतिनिधि कहानियाँ (राजकमल सीरीज़); थिएटर। निबन्ध-संग्रह : शैतान के बहाने, रचना के बदले, पढ़ते-पढ़ते, सबद निरन्तर, आड़ू का पेड़, स्वधर्म और कालगति तथा स्वाधीन इस देश में। यात्रा-वृत्तान्त : बहुवचन में दो यात्रा-वृत्तान्त संकलित तथा एक लम्बी छाँह। अंग्रेज़ी में : येट्स एंड एलियट : पर्सपैक्टिव्ज़ ऑन इंडिया, जयशंकर प्रसाद तथा टेमेनोए अकादमी लन्दन द्वारा चार व्याख्यानों की पुस्तिका प्रकाशित।

    सम्मान : सर्जनात्मक उपलब्धियों के लिए मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का शिखर-सम्मान, कविता-संग्रह नदी भागती आई के लिए मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, उपन्यास पूर्वापर के लिए भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता तथा निबन्ध-संग्रह स्वधर्म और कालगति के लिए उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति : भोपाल के हमीदिया कॉलेज से अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर-विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के उपरान्त निराला सृजनपीठ, भोपाल के निदेशक पद पर कार्यरत।

    सम्पर्क : निराला  सृजनपीठ  सी-165/1, प्रोफ़ेसर्स कालोनी, भोपाल-462 002

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