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Prakrati Aur Prakratish

Prakrati Aur Prakratish

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  • Pages: 163p
  • Year: 2011
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126720026
  •  
    परमजीत सिंह (जन्म 1935) देश के उन महत्त्वपूर्ण आधुनिक चित्रकारों में से हैं जिन्होंने अपने समय के प्रचलित आधुनिक मुहावरों की चिन्ता न करके अपना एक अलग और लम्बा रास्ता खोजा है । पिछले 55 से भी अधिक सालों में एक अद्भुत समर्पण, एकाग्रता और निजी आग्रहों के प्रति एक गहरी निष्ठा से वह अपनी कला भाषा को विकसित करते रहे हैं । एक समय उनकी कला पर अतियथार्थवादी (सररियलिस्ट) चित्र भाषा का असर था पर धीरे–धीरे उन्होंने अपने प्रकृति प्रेम को कलाकार की गहरी आ/यात्मिक साधना में रूपान्तरित कर दिया है । ‘प्रकृति और प्रकृतिस्थ’ पुस्तक में परमजीत सिंह के जीवन, विकास और कला सरोकारों की गहरी छानबीन की गई है । लेखक ने कलाकार से अनेक लम्बी अनौपचारिक भेंटवार्ताओं के अलावा परमजीत की निजी आर्काइव और उनके दौर के कलाकारों और कला समीक्षकों से बातचीत करके इस एक बड़े कलाकार की दुनिया को कला–प्रेमियों के सामने प्रस्तुत किया है । परमजीत सिंह की कला में लैंडस्केप केन्द्र में है पर उन्होंने लैंडस्केप कला को एक नई गरिमा और पहचान दिलाई है । उनके लैंडस्केप सुन्दर दृश्यों की स्मृतियाँ मात्र नहीं हैं, उनमें एक रहस्यमय दुनिया में प्रवेश की दुर्लभ कुंजियाँ हैं और चिन्ता व आशंका का एक अद्वितीय संसार भी है । आशंका की आहटें उनके लैंडस्केप चित्रों को अपने समय का स्मरणीय दस्तावेज बना देती हैं । इस पुस्तक में कलाकार और उनके मित्रों–स्वजनों के अनेक दुर्लभ चित्र हैं, विभिन्न चरणों में किए गए कलाकार के काम का एक प्रतिनिधि चयन है और आजादी के बाद के उस दौर को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की एक सार्थक कोशिश है जो परमजीत की कला के विकास में निर्णायक साबित हुई ।

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    Vinod Bhardwaj

    विनोद भारद्वाज

    जन्म: 1948 लखनऊ में।

    विनोद भारद्वाज ने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1971 में मनोविज्ञान में एम.ए. के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया के हिन्दी प्रकाशनों में पत्रकारिता शुरू की। वहाँ 25 सालों की नौकरी में धर्मयुग, दिनमान और नवभारत टाइम्स सरीखे प्रकाशनों में फिल्म, कला, संस्कृति, साहित्य आदि पर नियमित लिखा। 1967-69 में कविता-कला की लघु पत्रिका ‘आरम्भ’ का सम्पादन किया। 1981 में उन्हें कविता के लिए भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और सर्जनात्मक लेखन के लिए प्रतिष्ठित संस्कृति पुरस्कार मिला। 1989 में उन्हें लेनिनग्राद (तत्कालीन सोवियत संघ) के पहले अन्तर्राष्ट्रीय गैर कथा फिल्म महोत्सव की ज्यूरी का सदस्य चुना गया। जलता मकान, होशियारपुर (कविता संग्रह), नया सिनेमा, समय और सिनेमा, सिनेमा: कल, आज, कल (फिल्म पर पुस्तकें), समकालीन भारतीय कला: एक अन्तरंग अध्ययन, कला के सवाल, कला-चित्रकला, वृहद आधुनिक कला कोश, रामचन्द्रन का कला संसार, प्रकृति और प्रकृतिस्थ (कला पर पुस्तकें), चितेरी (कहानी संग्रह), समय सच्चाई और सपने (टिप्पणियाँ और स्तम्भ) और संस्कृति संवाद (भेंटवार्ताएँ) आदि विनोद भारद्वाज के प्रमुख प्रकाशन हैं। धूमीमल गैलरी के सूजा के विशाल संग्रह के कैटलाग (अंग्रेजी) का उन्होंने सम्पादन भी किया है। राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, विदेश मंत्रालय, यू.जी.सी., दूरदर्शन और धूमील गैलरी आदि के लिए वह तीस से अधिक कला फिल्मों के सब्जेक्ट एक्सपर्ट रह चुके हैं। ललित कला अकादेमी की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर उन्होंने ‘आर्ट इन सिनेमा’ नाम के चर्चित कार्यक्रम को क्यूरेट किया, ‘समकालीन कला’ के दो अंकों का अतिथि सम्पादन किया और ‘कलाएँ आसपास’ पुस्तक का सम्पादन किया। इन दिनों ‘नई दुनिया’ दैनिक में नियमित कला लेखन।

    सम्पर्क: एफ-16, प्रेस एन्क्लेव, साकेत, नई दिल्ली-110017

    (मोबाइल): 09811596465

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