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Pravasi Ki Kalam Se

Pravasi Ki Kalam Se

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  • Pages: 304P
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788181970251
  •  
    भारतीय रंगमंच के दिशा-प्रवर्तकों में से एक बादल सरकार के पत्रों, डायरियों आदि का यह संग्रह उनके निर्माणकारी दिनों का लेखा-जोखा है, जिससे हम उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके संवेदनशील रंगकर्मी की संरचना को समझने की शुरुआत भी कर सकते हैं। मूल रूप से बांग्ला में ‘प्रबासेर हिजिबिजी’ शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक में सितंबर, 1957 से सितंबर, 1959 तक के उनके लंदन प्रवास (दो साल), जुलाई 1963 से मार्च 1964 तक के उनके फ्रांस प्रवास(नौ महीने) और जुलाई 1964 से जून 1967 तक (तीन साल) के नाइजीरिया प्रवास का रचनात्मक साक्ष्य है। यह उनके संघर्षमय जीवन के एक कालखंड का अत्यंत मार्मिक एवं प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है। ग्रंथ में एक जगह उन्होंने लिखा है कि जो बातें दूसरों से कही जा सकती थीं, वे पत्रों के माध्यम से कही गई हैं। जिन्हें अपने तईं ही रखना चाहता था, वे डायरी के पृष्ठों में ग्रथित हैं और जो डायरी में भी नहीं कही जा सकीं, वे कविताओं का बाना पहनकर व्यक्त हुई हैं। करीब डेढ़ सौ पृष्ठों की इस सामग्री को काल- क्रमानुसार सँजोया गया है जिससे एक खूबसूरत चित्र बना है जिसकी नाना रेखाएँ, नाना रंग, नाना आकार-प्रकार अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ आवश्यकता एवं प्रसंगानुसार उकेरे गये हैं।

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    Pratibha Agarwal

    जन्म: 10 अगस्त, 1930, वाराणसी। स्थायी निवास कोलकाता, 1945 से। हिन्दी साहित्य में एम.ए. एवं हिन्दी मुहावरों के संकलन, विवेचन-विश्लेषण एवं कोश-सम्पादन के शोधकार्य पर डी.फिल्. एवं डी.लिट्. की उपाधियाँ। अध्ययन, अध्यापन, लेखन एवं अनुवाद तथा रंगकर्म के विविध पक्षों के साथ गहरा लगाव। सन् 1971 से पूरे समय रंगमंचीय गतिविधियों के लिए समर्पित। लेखिका तथा अनुवादिका के अतिरिक्त हिन्दी रंगमंच में एक महत्त्वपूर्ण  अभिनेत्री के रूप में भी प्रतिष्ठित। मौलिक ग्रंथ: सूरदास (नाटक, 1978), सृजन का सुख-दुख (रंग-संस्मरण, 1981), खेल-खेल में (बच्चों की कविताएँ, 1986), मोहन राकेश (1987), हिन्दी मुहावरों का विवेचनात्मक विश्लेषण (1988), दस्तक ज़िंदगी की, मोड़ जिं़दगी का (आत्मकथाएँ, 1990 एवं 1996) तथा पयारे हरिचंदजू (जीवनीपरक उपन्यास, 1997)।

    लेखन एवं सम्पादन: मास्टर फिदा हुसैन: पारसी रंगमंच पर पचास वर्ष, हबीब तनवीर: एक रंग व्यक्तित्व।

    तीस से अधिक नाटकों का अनुवाद एवं कई उपन्यासों के नाट्यरूपांतर।

    रंगमंच के क्षेत्र में तथ्य संग्रह करनेवाली पहली संस्था नाट्य शोध संस्थान की 25 वर्ष पूर्व स्थापना और तभी से उसके संगठन व संचालन से सम्बद्ध।

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