• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Pravasi Mazduron Ki Peeda

Pravasi Mazduron Ki Peeda

Availability: Out of stock

Regular Price: Rs. 195

Special Price Rs. 175

10%

  • Pages: 171p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171194150
  •  
    मजदूरों का विस्थापन न तो अकेले भारत में हो रहा है, न आज पहली बार । सभ्यता के प्रारंभ से ही कामगारों-व्यापारियों का आवागमन चलता रहा है, लेकिन आज भूमंडलीकरण के दौर में भारत में मजदूरों को प्रवासी बनानेवाली स्थितियाँ और वजहें बिलकुल अलग किस्म की हैं । उनका स्वरूप इस कदर अलग है कि उनसे एक नए घटनाक्रम का आभास होता है । ज्ञात इतिहास में शायद ही कभी, लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में मजूदूर अपना घर-बार छोड्‌कर कमाने, पेट पालने और अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए बाहर निकल पड़े हों । देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार और सबसे विकसित राज्य पंजाब के बीच मजदूरों की आवाजाही आज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है । यह संख्या लाखों में है । पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ के शहरी-ग्रामीण जीवन में बिहार के 'भैया' मजदूर अनिवार्य अंग बन गए हैं और बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों के जीवन और नए विकास की सुगबुगाहट में पंजाब की कमाई एक आधार बनती जा रही है । यह पुस्तक इसी प्रवृत्ति, इसी बदलाव, इसी प्रभाव के अध्ययन की एक कोशिश है । इस कोशिश में लेखक के साल भर गहन अध्ययन, लंबी यात्राओं और मजदूरों के साथ बिताए समय से पुस्तक आधिकारिक दस्तावेज और किसी रोचक कथा जैसी बन पड़ी है । पंजाब और बिहार के बीच शटल की तरह डोलते मजदूरों की जीवन शैली की टोह लेती यह कथा कभी पंजाब का नजारा पेश करती है तो कभी बिहार के धुर पिछड़े गाँवों का । शैली इतनी रोचक और मार्मिक है कि लाखों प्रवासी मजदूरों और पंजाब पर उनके असर के तमाम विवरणों का बखान करती यह कब खत्म हो जाती है, इसका पता ही नहीं चलता ।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Arvind Mohan

    अरविन्द मोहन

    पढ़ाई के दौरान आधुनिक भारत के इतिहास में गहरी रुचि रखनेवाले अरविन्द मोहन ने 1982 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री पाई और उसके बाद से ही आर्थिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया। वे 1983 से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ और फिर 1986 से प्रकाशित पाक्षिक हिंदी समाचार पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ की प्रारंभिक टोली के सदस्य रहे। दिसंबर, 1995 में दैनिक ‘हिंदुस्तान’ में सहायक संपादक पद पर कार्यरत। अपने पत्रकार-जीवन में उन्होंने आर्थिक विषयों के साथ ही प्रायः सभी विषयों पर खूब पढ़ा-लिखा। 1993 में प्रकाशित उनकी संपादित किताब ‘गुलामी का खतरा’ ने नई आर्थिक नीतियों के आलोचनात्मक विश्लेषण की शुरुआत की। 1974 के जेपी आंदोलन से प्रेरित अरविन्द मोहन अब तक चलने वाली विविध समांतर राजनैतिक गतिविधियों से निकट संबंध रखते आए हैं।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144