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Rajkamal Choudhary Rachanawali (Vol. 1-8)

Rajkamal Choudhary Rachanawali (Vol. 1-8)

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Regular Price: Rs. 3,000

Special Price Rs. 2,700

10%

  • Year: 2015
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126728787
  •  
    राजकमल चौधरी का रचना-संसार स्वातंत्रयोत्तर भारत के प्रारंभिक दो दशकों के बौद्धिक पाखंड, आर्थिक बदहाली, राजनितिक दुर्व्यवस्था, सामाजिक धूर्तता, मानव-मूल्य और नीति-मूल्य के ह्रास, रोटी-सेक्स-सुरक्षा के इंतजामों में सारी नैतिकताओं से विमुख बुद्धिजीवियों के आचरण, खंडित अस्तित्व और भग्नमुख आजादी की चादर ओढ़े समाज की तमाम बदसूरती, और उन बद्सुर्तियों के कारणों का दस्तावेज है ! इस दस्तावेज में वह चाहे कविता, कहानी, उपन्यास हो, या निबंध, आलोचना, डायरी उनमे समाज की विकृति का वास्तविक चित्र अंकित हुआ, भयावह यथार्थ का क्रूरतम चेहरा सामने आया, जो आज तक बना हुआ है ! राजकमल चौधरी के रचना-संसार में भाषा, संस्कृति, समाज से निरपेक्ष गिनती के लोग अपना ऐश्वर्य बनाने में जीवन-संग्राम के सिपाहियों के हिस्से की ध्वनि, धूप, पवन, प्रकाश पर काबिज होते जा रहे हैं ! गगनचुम्बी अहंकार और तानाशाही वृत्ति से आम नागरिक की शील-सभ्यता के हरे-भरे खेत को कुचल रहे हैं ! भाव और भाषा की तमीज से बेफिक्र लोग अर्थ-तंत्र और देह-तंत्र की कुटिल वृति में व्यस्त हैं ! सत्ताधारियों की राजनितिक करतूतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि मात्र पन्द्र वर्ष के अपने गभीर रचनाकाल में राजकमल चौधरी ने साढ़े तीन हजार पृष्ठों की अपनी श्रेष्ठ रचनाओं में शायद भावी भारत की पूर्वघोषणा ही कर दी थी ! अकविता के प्रमुख कवि राजकमल चौधरी के लिए कविता अपने विकट समय में जीवन और उसकी जमीन के लिए अभिव्यक्ति का हथियार थी ! रचनावली के इस पहले खंड में उन संकलनों की कविताएँ शामिल हैं जो कवि के जीवन-काल में प्रकाशित न हो सकीं ! ‘बेदाग दरपन’, ‘एक व्यक्ति प्राणहीन’, ‘अमृता के लिए कविताएँ’, ‘नंगी प्रार्थनाएं’, ‘विचित्रा’ जैसे पांडुलिपियाँ उसी कोटि की हैं ! मैथिली कविताओं के साथ-साथ राजकमल की वे फूलकर कविताएँ भी शामिल की गई हैं जो उनकी हस्तलिपि में प्राप्त हुईं ! प्रकाशित रचनाओं को प्रकाशन-तिथि के अनुसार रखा गया है, पर प्रधानता रचना-तिथि की ही है ! जिन रचनाओं की रचना-तिथि या प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं हुई, वे एक जगह अलग से रखी गई हैं ! निस्संदेह, पाठक राजकमल चौधरी की इन कविताओं से गुजरते हुए मनुष्य और उसकी पृथ्वी से जुड़े उन तमाम प्रश्नों से टकराएँगे जो आज भी हल नहीं किए जा सके हैं !

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    Rajkamal Chaudhari

    जन्म: 13 दिसम्बर, 1929 को अपने ननिहाल रामपुर हवेली में। पितृग्राम महिषी (सहरसा-बिहार)। इण्टरमीडिएट आर्ट्स में नामांकन, किन्तु उसे छोड़कर भागलपुर आकर इण्टरमीडिएट कॉमर्स में प्रवेश। मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर से 1955 में आई.कॉम.। 1953 में गया कॉलेज से बी.कॉम। लेखन की शुरुआत भागलपुर से ही हो गई थी। शिक्षा पूरी करने के बाद अधिकतर कलकत्ता में रहे। कई हिन्दी और मैथिली की पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। अन्तिम वर्षों में पूरी तरह स्वतंत्र लेखन। 19 जून, 1967 को पटना के अस्पताल में लम्बी बीमारी के बाद निधन।

    प्रकाशित कृतियाँ: हिन्दी में: अग्निस्नान, शहर था शहर नहीं था, नदी बहती थी, ताश के पत्तों का शहर, मछली मरी हुई (उपन्यास); बीस रानियों के बाइस्कोप, एक अनार: एक बीमार (लघु उपन्यास); मुक्ति प्रसंग, कंकावती, इस अकाल वेला में (कविता-संग्रह); मछली जाल, सामुद्रिक एवं अन्य कहानियाँ (कहानी-संग्रह)।

    मैथिली में: आदि कथा, पाथरफूल, आंदोलन (उपन्यास); स्वरगंधा, कविता राजकमलक (कविता-संग्रह); एकटा चंपाकली विषधर, कृति राजकमलक (कहानी-संग्रह)। अनूदित कृतियाँ: मूल बांग्ला से शंकर के उपन्यास चौरंगी और वाणी राय के उपन्यास चोखे आमार तृष्णा का हिन्दी अनुवाद।

    ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ शीघ्र प्रकाश्य।

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