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Bishrampur Ka Sant

Bishrampur Ka Sant

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  • Pages: 208p
  • Year: 2019, 8th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126715671
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    श्रीलाल शुक्ल रचित “विस्रामपुर का संत” – एक विवेचना Review by Suresh Tewari
    श्री श्रीलाल शुक्ल द्वारा रचित ‘राग दरबारी’ के बाद लिखी “विस्रामपुर का संत” एक अच्छी रचना है ! परंतु अगर आप यह सोचकर यह पुस्तक पढ़ते हैं कि राग दरबारी वाली चंचलता और उछ्रंकलता भरा प्रवाह मिलेगा तो यह पुस्तक आपको निराश कर सकती है ! राग दरबारी की एक - एक लाइन जहां पढ़ कर आप लोट्पोट होते हैं वहीं विस्रामपुर का संत कई बार उबाऊ हो जाती है !
    ‘विस्रामपुर का संत’ भूदान आंदोलन के पटल पर लिखी एक कथा है जिसके नायक एक सामंत परिवार में जन्मे कुंवर जयंतीप्रसाद सिंह हैं ! जयंतीप्रसाद में वह सारी महत्वाकांक्षायें, कमज़ोरियां , लालसाएं मौज़ूद है जो ऐसे व्यक्ति में होती हैं ! परंतु हर किसी की हर तमन्ना पूरी हो जाये ऐसा कोई आवश्यक भी नहीं ! जीवन के आठ दशक पूरे होने के बाद जब वह राज्यपाल जैसे उच्च पद से रिटायर होते हैं और उसके आगे भी कुछ और पाने मे असफल रहते है तो उनकी कुंठा, उनकी अतृप्त अभिलाषाओं और उनके अंतर्मन में चल रहे द्वंद्व और व्यथा की कहानी है ‘विस्रामपुर का संत’ ! लेखक ने उनके जीवन के कुछ अंतरंग पलों का बहुत ही चतुराई से वर्णन किया है और पाठक पूरी कहानी भर कुछ और की आशा लिये पुस्तक पढ़्ते जाता है ! और अंत में ऐसा पल आता है कि कुंवर जयंतीप्रसाद की अपनी लालसा ही उनके स्वयं के पुत्र के दाम्पत्य जीवन की डोर को ही काट देता है ! और यही वह पल है जब जयंतीप्रसाद को अपने जीवन की व्यर्थता का एहसास होता है ! इतना ही नहीं वह अपने जीवन को बेतवा नदी के हवाले कर देते हैं !
    पाठक पूरी कहनी भर विस्रामपुर के संत को खोजता रहता है और उसकी खोज़ भी बेतवा की लहरों में बह जाती हैं और वह ठगा सा खड़ा रह जाता है यह सोचते हुए कि उसने जो वक़्त इस पुस्तक में लगाये हैं कहीं व्यर्थ तो नहीं हो गये !
    अगर आप राग दरबारी के बाद ‘विस्रामपुर का संत’ पढ़ते हैं तो बेहतर होगा कि आप खुले मन से इसे बिना किसी अपेक्षा के पढ़े तभी आप पूरा आनंद ले पायेंगे !
    सुरेश तिवारी, गुड़गांव
    (Posted on 4/29/2015)

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