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Jaankidas Tejpal Mansion

Jaankidas Tejpal Mansion

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  • Pages: 184
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727735
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    जानकी दास तेजपाल मेनशन- अलका सरावगी।। समीक्षा। 'जानकी दास तेजपाल मेनशन' एक बस्तुनिष्ठ ईंट गारे की जर्जर इमारत ही नही बल्कि एक प्रतिकात्मक अर्थ बिस्तार भी है यह जर्जर इमारत जो आगे की ओर झुकी है एक व्यक्ति की गरमाहट व अपनापन भी है बिचार भी है समाज भी है रा Review by Vijay Kumar shukla
    जानकी दास तेजपाल मेनशन- अलका सरावगी।। समीक्षा।
    'जानकी दास तेजपाल मेनशन' एक बस्तुनिष्ठ ईंट गारे की जर्जर इमारत ही नही बल्कि एक प्रतिकात्मक अर्थ बिस्तार भी है यह जर्जर इमारत जो आगे की ओर झुकी है एक व्यक्ति की गरमाहट व अपनापन भी है बिचार भी है समाज भी है राष्ट्र भी है जिसकी ख़ालीपन 'साय साय' व 'सिसकता' है जो उपन्यास मे अन्तर्धारा की तरह संबेदित होता है। यहाँ बेदख़ल होना व बेदख़ल करना दोनो साथ -साथ ध्वनित है।'हथौडा' इमारत के उपरी मंज़िल पर ही नही बल्कि स्मृति व संबेदना पर लगातार चोट कर रहे है। तोड़ने के फ़ायदा व टूटने की अनतरबेदना उपन्यास को लगातार द्वन्द द्वारा जीवंत बनाये हुए है।
    अलका जी का यह उपन्यास स्मृति व वर्तमान व्यवस्था के द्वन्द का आख्यान व उपख्यान का अतिक्रमण कर एक महाख्यान बनाते है। एक ही व्यक्ति जयगोबिन्द व जगदीप स्वयं से ही निर्वासित है कभी कलकत्ता से ते कभी अमेरिका से कभी स्वयं के परतिरूप व व कभी स्वयं लिखे जा रहे अधूरे आत्मकथात्मक उपन्यास से लगातार टकराते है।
    यहाँ अमेरिका समानानतर द्वन्द की तरह आता है। कभी प्रेमिका बीफ खाने वाली मिशेल :कभी वियतनाम :कभी बिकलिक्स :बेटा रोहित तो भारत को जाति व्यवस्था का 'चिड़िया घर 'समझता है जो रिसता रहता है।यहाँ अमेरिका मे हार्न नही बजता ;हर पाबंदी का बिरोध होता है वह समाज जो नारे पोस्टर से आगे सोच नही पाता । यहाँ जयगोबिन्द को सारे लड़ाईयों को ताक़त 'अमेरिका मे ली गयी साँसों से मिला है।'डाउकेमिकल' 'पी एल ४८०' एक प्रतीकात्मक इतिहास की त्रासदी के रूप मे आता है।
    नक्सली देवनाथ व शान्तनु 'जाने ख़ुद मुर्ख बन रहे है या मुर्ख बना रहे है' प्रोफ़ेसर ;रेलवे व मिलीटरी ही बम बनाने का सामान मुहैय्या कराते है।
    आफ़ताब हुसेन जैसा शरीफ़ 'सिर्फ़ डराने धमकाने का चेहरा है उसके पीछे कोई और है जो कभी सामने नही आता'। ' आफ़ताब व पप्पू बनाने के लिए लोग अपने पैसे लगाते है पर जय बाबू बनाने के लिए इससे ज्यादे पैसे' यह सफ़ेदपोश हक़ीक़त है। पर स्मृति एसी है कि लोग मान ही नही पाते कि जय बाबू 'काईंया चालाक व धूर्त है' मिंटू चौधरी 'अख़बार के माध्यम से ब्लैकमेल का धंधा चलाता है' उसके लिए सबसे बड़ी बात 'कनेक्शन ' है सारे संबंध यहाँ 'कनेक्श'न मे बदल जाते है । भ्रष्टाचार यहाँ 'एक्स्टरा दीमाग ' के रूप मे आता है जो सिस्टम को अपने शर्त पर चलाता है' यहाँ 'रूल फालो बाई फूल है'
    अलका सरावगी( Alka Saraogi) जी मे अभी भी 'कलीकथा 'वाली ही ऊर्जा शेष है। जिन्हें शिकायत है कि हिन्दी मे अच्छा नहीं लिँखा जा रहा वे इसे ज़रूर पढ़े।स्मृतियों की इन्द्र धनुषीय जादू । एक पठनीय उपन्यास जो उपन्यास के ही शब्दों मे कहूँ तो 'आउट स्टैडिंग' है। इस साल का यह बेस्ट उपन्यास हो सकता है पुरस्कार तो मिलेंगे ही पर सबसे बड़ा पुरस्कार पाठकों द्वारा की गयी प्रसंशा होती है जिसमें खरी उतरेगी । बेस्ट आफ लक अलका जी। (Posted on 4/25/2015)

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