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Samay O Bhai Samay

Samay O Bhai Samay

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  • Pages: 141p
  • Year: 2018, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126707216
  • ISBN 13: 9788126707218
  •  
    यह एक सुपरिचित तथ्य है कि कवि पाश की पैदाइश एक आंदोलन के गर्भ से हुई थी । वे न सिपऱ़् एक गहरे अर्थ में राजनीतिक कवि थे, बल्कि सक्रिय राजनीति–कर्मी भी थे । ऐसे कवि के साथ कुछ खतरे होते हैं, जिनसे बचने के लिए यथार्थ चेतना के साथ–साथ एक गहरी कलात्मक चेतना, बल्कि कला का अपना एक आत्म–संघर्ष भी ज़रूरी होता है । पाश की कविताएँ इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं कि उनके भीतर एक बड़े कलाकार का वह बुनियादी आत्म–संघर्ष निरंतर सक्रिय था, जो अपनी संवेदना की बनावट, वैचारिक प्रतिबद्धताएँ और इन दोनों के बीच के अंत:संबंध को निरंतर जाँचता–परखता चलता है । प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ, अनेक स्रोतों से एकत्र की गई हैं–यहाँ तक कि कवि की डायरी और घर–परिवार से प्राप्त जानकारी को भी चयन का आधार बनाया गया है । पुस्तकों से ली गई कविताओं पर तो कवि की मुहर लगी है, पर डायरी से प्राप्त रचनाओं या काव्यांशों को देकर पाश के उस पक्ष को भी सामने लाया गया है, जहाँ एक सतत विकासमान कवि के सृजनरत मन का एक प्रामाणिक प्रतिबिंब सामने उभरता है । पाश की कविता उदाहरण होने से बचकर नहीं चलती । वे उन थोड़े–से कवियों में हैं, जिनकी असंख्य पंक्तियाँ पाठकों की ज़बान पर आसानी से बस जाती हैं । नीचे की पंक्तियाँ मुझे ऐसी ही लगीं और शायद उनके असंख्य पाठकों को भी लगेंगी–चिन्ताओं की परछाइयाँ/उम्र के वृक्ष से लम्बी हो गर्इं/ मुझे तो लोहे की घटनाओं ने/रेशम की तरह ओढ़ लिया । –केदारनाथ सिंह

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    Pash

    पाश

    जन्म: 9 सितंबर, 1950। जन्म-स्थान: तलवंडी सलेम नामक गाँव, तहसील नकोदर, जिला जालंधर (पंजाब)। पूरा नाम: अवतार सिंह संधू। आठवें और नवें दशक

    में उभरे पंजाबी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवि। पहली कविता 15 वर्ष की आयु में लिखी। पहली बार कवि के रूप में 1967 में छपे।

    हायर सेकंडरी के बाद प्राइवेट रूप में बी.ए.। गाँव में स्कूल खोला। बाद में ‘सिआड़’ (1972-73), ‘हेम ज्योति’ (1974-75) और हस्तलिखित ‘हाक’ (1982) नामक पत्रिकाओं का संपादन। 1985 में अमेरिका चले गए। वहाँ ‘एंटी-47’ (1986-88) का संपादन करते हुए खालिस्तानी आंदोलन के विरुद्ध सशक्त प्रचार-अभियान। 1978 में शादी। 1980 में एक बेटी का जन्म।

    1967 से सी.पी.आई. से जुड़े। 1969 से नक्सलवादी राजनीति से। 1988 में कुछ दिनों के लिए घर आए कि 23 मार्च को (अमेरिका वापसी से दो दिन पहले) गाँव में ही अपने एक अभिन्न मित्र हंसराज के साथ खालिस्तानी आतंकवादियों की गोलियों का शिकार।

    प्रकाशित कविता-संग्रह: लौह कथा (1970), उड्डदे बाजाँ मगर (1974), साडे समियाँ विच (1978), लड़ांगे साथी (1988)। हिन्दी में अनूदित: बीच का रास्ता नहीं होता, समय ओ भाई समय।

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