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Sankal, Sapne Aur Sawal

Sankal, Sapne Aur Sawal

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  • Pages: 272
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789388211499
  •  
    प्रतिष्ठित रचनाकार सुधा अरोडा का वैचारिक और रचनात्मक लेखन स्त्री के सवालों और उसकी चिंताओं का पक्षधर रहा है । वे किसी पूर्व-निधीरित आग्रह या घिसे-पिटे स्त्रीवादी नारों को दोहराने की जगह एक खुले, परिवर्तनशील और आधुनिक समाज में व्यावहारिक स्तर पर स्री को पुरुष के बरक्स बराबरी का सम्मानजनक हिस्सा दिलवाने में यकीन रखती है । "साँकल, सपने और सवाल" में लेखिका के पिछले बीस वर्षों के लेखन से चुने गए आलेख संग्रहित है ! इनमें पाठक को समाज की उन सॉकलों और वर्जित दहलीजों को लांघने का साहस दिखाई देगा, जिनपर सदियों से दुराग्रहो और वर्जनाओं के तालों का साम्राज्य रहा है । भारतीय सामजिक पृष्ठभूमि और उसकी पारंपरिक सीमाओं के बीच शहरी एवं आंचलिक स्त्री के लिए नैसर्गिक स्पेस की ज़रुरत और उसकी जायज मांग ही इन आलेखों का बीज सूत्र है । इन आलेखों के विषय आज की स्त्री के फैलते आकाश की तरह चहुमुखी और विविध है । धर्म, मीडिया, फिल्म और साम्प्रदायिकता से लेकर समलैंगिकता, तेजाबी हमलें, शिक्षित लड़कियों की आत्महत्या, संपत्ति अधिकार यानी घरेलू और सामाजिक शोषण के हर पहलू पर लेखिका की पैनी नज़र है । वे मानती हैं कि आज के तेजी से बदलते समाज में स्त्री का समय किसी सीमित चौखट के भीतर कैद नहीं किया जा सकता । विविध मुद्दों पर सुधा जी कई सवालों से टकराती है । इस उत्तर आधुनिक और ग्लोबल समय में स्त्री देह के भोगवादी नजरिए के विरुद्ध सुधा अरोडा का कारगर हस्तक्षेप रेखांकित किया जा सकता है ! बेहद आसान और सरल भाषा में लिखे गए इन आलेखों की पठनीयता एवं प्रतिबद्धता ही अंतत: इनकी सबसे बडी सफलता और सार्थकता है ।

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    Sudha Arora

    सातवें दशक की चर्चित कथाकार सुधा अरोड़ा का जन्म 4 अक्टूबर, 1946 को लाहौर में हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1967 में हिन्दी साहित्य में एम.ए. तथा बी.ए. ऑनर्स में दो बार स्वर्णपदक प्राप्त करनेवाली सुधा जी ने 1969 से 1971 तक कलकत्ता के दो डिग्री कॉलेजों में अध्यापन-कार्य किया।

    उनकी पहली कहानी 'मरी हुई चीज़’ 'ज्ञानोदय’—सितम्बर 1965 में और पहला कहानी-संग्रह 'बगैर तराशे हुए’ 1967 में प्रकाशित हुआ। 1991 में हेल्प सलाहकार केन्द्र, मुम्बई से जुड़ने के बाद वे सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित रहीं।

    अब तक उनके बारह कहानी-संकलन—जिनमें 'महानगर की मैथिली’, 'काला शुक्रवार’ और 'रहोगी तुम वही’ चर्चित रहे हैं, एक कविता-संकलन तथा एक उपन्यास के अतिरिक्त वैचारिक लेखों की दो किताबें 'आम औरत : जि़न्दा सवाल’ और 'एक औरत की नोटबुक’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर अनुवाद, सम्पादन और स्तम्भ-लेखन भी किया है तथा भंवरीदेवी पर बनी फि़ल्म 'बवंडर’ की पटकथा लिखी है।

    कहानियाँ लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, फ्रेंच, पोलिश, चेक, जापानी, डच, जर्मन, इतालवी तथा ताजिकी भाषाओं में अनूदित और इन भाषाओं के संकलनों में प्रकाशित।

    1977-78 में पाक्षिक 'सारिका’ में 'आम औरत : जि़न्दा सवाल’, 1997-98 में दैनिक अखबार 'जनसत्ता’ में साप्ताहिक स्तम्भ 'वामा’, 2004 से 2009 तक 'कथादेश’ में 'औरत की दुनिया’ और 2013 से 'राख में दबी चिनगारी’—उनके स्तम्भ ने साहित्यिक परिदृश्य पर अपनी ख़ास जगह बनाई है।

    1978 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का विशेष पुरस्कार, 2008 में 'भारत निर्माण सम्मान’, 2010 में 'प्रियदर्शिनी पुरस्कार’, 2011 में 'वीमेन्स अचीवर अवॉर्ड’, 2012 में 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी सम्मान’ और 2014 में 'वाग्मणि सम्मान’ आदि से सम्मानित।

    सम्प्रति : मुम्बई में स्वतंत्र लेखन।

    सम्पर्क : 1702, सॉलिटेयर, हीरानन्दानी गार्डेन्स, पवई, मुम्बई-400 076

    फोन : 022 4005 7872

    sudhaarora@gmail.com

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