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Sansad Se Sarak Tak

Sansad Se Sarak Tak

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  • Pages: 127p
  • Year: 2018, 4th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126724499
  •  
    धूमिल सच्चे अर्थ में एक जनकवि हैं। उनकी ‘संसद से सड़क तक’ की कविताएँ इस बात की साक्षी हैं कि धूमिल का कवि संघनित अनुभूतियों का ही कवि नहीं है बल्कि अनुभूतियों से निकलकर विचारों की यात्रा करना भी उसे प्रिय है। ‘संसद से सड़क तक’ की कविताएँ भावात्मक सार पर तो पाठक को स्पर्श करती ही हैं बौद्धिक स्तर पर भी ये कविताएँ उन्हें उद्वेलित करती हैं। भारतीय राजनीति में लोकतन्त्र के चरित्र को धूमिल ने अपनी कविता ‘जनतन्त्र के सूर्योदय में’ जिस तरह उजागर किया है, वह चकित करता है। उनकी कविताओं में वर्तमान समय के ढेरों ज़रूरी किन्तु अनुत्तरित सवाल हैं। ‘पटकथा’, ‘मुनासिब कार्रवाई’, ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ तो इस बात की गवाही भी देती हैं कि धूमिल को आत्म-साक्षात्कार प्रिय है। और ख़ुद से रू-ब-रू होना कितना कठिन होता है, यह हर विज्ञ व्यक्ति जानता है। ‘मोची राम’, ‘रामकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल’, ‘दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ सरीखी कविताएँ धूमिल के गहरे आत्मविश्वास की पहचान कराती हैं। एक ऐसे आत्मविश्वास की पहचान जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ से प्रकट हुई है। कहना न होगा कि जर्जर सामाजिक संरचनाओं और अर्थहीन काव्यशास्त्र को आवेग, साहस, ईमानदारी और रचनात्मक आक्रोश से निरस्त कर देनेवाले रचनाकार के रूप में धूमिल अविस्मरणीय हैं।

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    Sudama Panday Dhoomil

    धूमिल

    पूरा नाम : सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’

    जन्म : 9 नवम्बर, 1936, गाँव खेवली, बनारस

    (उत्तर प्रदेश)।

    शिक्षा : प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में। कूर्मि क्षत्रिय इंटर कॉलेज, हरहुआ से 1953 में हाईस्कूल।

    आजीविका के लिए काशी से कलकत्ता तक भटके। नौकरी मिली तो मानसिक यंत्रणा भारी पड़ी। ब्रेन ट्यूमर से पीडि़त रहे।

    धूमिल साठोत्तर हिन्दी कविता के शलाका पुरुष हैं। पहली कविता कक्षा सात में लिखी। प्रारम्भिक गीतों का संग्रह—‘बाँसुरी जल गई’ फिलहाल अनुपलब्ध। कुछ कहानियाँ भी लिखीं। धूमिल की कीर्ति का आधार वे विलक्षण कविताएँ हैं जो संसद से सडक़ तक (1972), कल सुनना मुझे और सुदामा पाण्डेय का लोकतंत्र (1983) में उपस्थित हैं।

    धूमिल सच्चे अर्थ में जनकवि हैं। लोकतंत्र को आकार-अस्तित्व देनेवाले अनेक संस्थानों के प्रति मोहभंग, जनता का उत्पीडऩ, सत्यविमुख सत्ता, मूल्यरहित व्यवस्था और असमाप्त पाखंड धूमिल की कविताओं का केन्द्र है। वे शब्दों को खुरदरे यथार्थ पर ला खड़ा करते हैं। भाषा और शिल्प की दृष्टि से उन्होंने एक नई काव्यधारा का प्रवर्तन किया है। जर्जर सामाजिक संरचनाओं और अर्थहीन काव्यशास्त्र को आवेग, साहस, ईमानदारी और रचनात्मक आक्रोश से निरस्त कर देनेवाले रचनाकार के रूप में धूमिल विस्मरणीय हैं।

    निधन: 10 फरवरी, 1975

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