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Sarjnatmak Kavyalochan

Sarjnatmak Kavyalochan

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  • Pages: 272p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318276
  •  
    हिन्दी में सर्जनात्मक काव्यालोचन का प्राय: अभाव रहा है, जिससे आलोचना की सर्जनात्मक मौलिकता अब तक स्थापित-प्रतिष्ठित नहीं हो पायी है । अभाव-रूपी इस अफाट सन्नाटे को भंग करनेवाली डॉ. 'शीतांशु' की यह पुस्तक ऐसी पहली सहृदय-संवेद्य, प्रगुणात्मक पुस्तक ए,, जिसमें लेखक ने 28 हिन्दी कविताओं के काव्यमर्म तथा अन्तर्न्यस्त साभिप्रायता को उद्‌घाटित-विवेचित किया है । कविता का विवेचन उसकी सर्जनात्मक सार्थकता का विवेचन होता है । यह सार्थकता भावकीय प्रतिभा से कविता की कलावटी गाँठों को खोलते हुए उसके अर्थ-गहवर में प्रवेश करने से सम्भव हो पाती है । हिन्दी काव्यालोचन अब तक अपनी लक्ष्मण-रेखा में घिरा रहा है । वह प्रवृत्तिगत, विकासात्मक, सैद्धान्तिक और वादारोपित बहस- मुबाहसे से ग्रस्त-सा है । मार्क्सवादी आलोचना को तो अपनी एकरसता में किसी भी कविता की आन्तर गहराई में उतरने से प्राय: परहेज ही रहा है, जिसके कारण कविता का भावन और बोधन केवल सामाजिक यथार्थ की अभिधेयात्मकता तक सीमित-प्रतिबन्धित रह गया है, जबकि उसमें अशेष प्रतीयमान, सर्जनात्मक साभिप्रायता विद्यमान होती है । यहाँ तक कि इसमें मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थ की अनेकानेक परतें भी समाविष्ट रहती हैं । ऐसे में प्रतीयमान आभ्यन्तर को उद्‌घाटित करनेवाली यह वह प्रतीक्षित आलोचना-कृति है, जो स्थापित करती है कि कविता की सही पहचान- परख उसके तलान्वेषित कथ्यों और अर्थच्छवियों की बहुआयामिता पर निर्भर है । कहना होगा कि कविताओं की साभिप्राय पुनस्सर्जना के माध्यम से काव्यलोचन के नये क्षितिज का सन्धान और दिशा-निर्देश करनेवाली यह पुस्तक अब तक की निर्धारित लक्ष्मण-रेखा के बाहर जाकर हिन्दी काव्यालोचन को समृद्ध करती है । साथ ही नयी आलोचकीय प्रतिभाओं को इस दिशा में सक्रिय होने हेतु आमन्त्रित भी करती है । हिन्दी आलोचना में कविता के पाठकों और आलोचकों को संवेदन-समृद्ध करने वाली एक अत्यन्त उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक ।

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    Pandey Shashibhushan Shitanshu

    पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'
    जन्म : 13 मई 1941
    शिक्षा : पी-एच. डी. (हिन्दी), डी. लिट् (भाषा- विज्ञान), स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) ।
    व्यक्तित्व : सैद्धान्तिक और सर्जनात्मक आलोचक । साहित्य-सिद्धान्त, साहित्य-विश्लेषण और प्रत्यालोचन के लिए सिद्ध-प्रसिद्ध । व्यापक, गहन अध्ययन एवं मौलिक संदृष्टि से सम्पन्न भाषाविज्ञानी । प्रखर, तार्किक वक्ता एवं लेखक ।
    वृत्ति : अध्यापन 1961 - 77 भागलपुर विश्वविद्यालय सेवा में व्याख्याता । 1977- 85 गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय (अमृतसर) में हिन्दी के वरिष्ठ रीडर । 1985 पूना विश्वविद्यालय (पुणे) में हिन्दी भाषा के प्रोफेसर । कुछ ही समय बाद 1985 में गुनाके, विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर । 1986-  1989 वहीं हिन्दी विभाग में प्रोफेसर-अध्यक्ष ।  1992 - 1994 वहीं भाषा-संकाय के अधिष्ठाता ।  1992, 95 भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भारत सरकार (नयी दिल्ली) द्वारा क्रमश: त्रिनिदाद और पेइचिंग के लिए विजिटिंग प्रोफेसर पद पर चयनित । फरवरी 200 -जनवरी 2007 महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) में विजिटिंग प्रोफेसर । सम्पादन : 01 फरवरी 2007-30 अप्रैल  2008 वहीं वरिष्ठ अतिथि सम्पादक के बतौर तुलनात्मक साहित्य विश्वकोश (1350 पृष्ट) तैयार किया । जुलाई 2008 में विश्वकोश प्रकाशित ।
    उच्चतर शोध एवं शोध-निर्देशन : यूजीसी. (नई दिल्ली) द्वारा संभरित दो बृहत् शोध-परियोजनाएँ ससम्पन्न-1गुरुमुखी लिपि में उपलब्ध हिन्दी साहित्य : समाज-सांस्कृतिक अध्ययन, 2. रामचरितमानस : संकेत- विसंरचनात्मक शैलीवैज्ञानिक सन्दर्भ । अब तक 48 पी-एच. डी. एवं 57 एम.फिल. शोधार्थियों को अपने ससफल निर्देशनमें उउपाधि दिलायी।
    अवकाश-ग्रहण : 30 जून, 2001
    लेखन : अब तक प्रकाशित 300 से अधिक शोधपत्र एवं  26 पुस्तकें ।

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