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Shamsher Bahadur Singh Ki Alochana-Drishti

Shamsher Bahadur Singh Ki Alochana-Drishti

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  • Pages: 270
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789388211413
  •  
    शमशेर एक बड़े कवि के साथ-साथ एक आलोचक भी हैं । एक कवि- आलोचक । इस बात का साक्ष्य उनकी पहली आलोचनात्मक कृति ' दोआब' है । उन्होंने भारतीय साहित्य की परम्परा के महान रचनाकारों और साथ ही अपने समकालीन रचनाकारों और उनकी रचनाओं यर दिलचस्पी के साथ आलोचनात्मक चिंतन किया है । शमशेर ने ऐसे रचनाकारों पर उस समय आलोचनाएँ लिखी हैं जब हिन्दी आलोचना में उन पर बात करना मुनासिब नहीं समझा जाता था; क्योंकि हिन्दी आलोचना बहुधा पूर्वग्रहों और दायित्वहीँनता का शिकार होती रही है । शमशेर को आलोचना-दृष्टि का सबसे सबल पक्ष उसकी प्रगतिशीलता एवं भारतीयता है । आज का परिवेश इतिहासबोध, सदियों से चली आ रही सामाजिक संरचना और मौजूदा व्यवस्था में जीवनानुक्रूल परिवर्तन की बात करता है । इसके लिए संघर्ष की आवश्यकता होती है । शमशेर को जिस किसी रचना और रचनाकार में यह संघर्ष दिखता है; वह उन्हें अपील करता है । उनकी मनोभूमि और रचनात्मक चिन्ताओं को जानने-समझने के लिए उनकी कविताओं से अधिक उनकी आलोचनाओं पर भरोसा किया जा सकता है । शमशेर ने अपनी आलोचनाओं में भारतीय संस्कृति पर भी चिन्तन किया है । वे अपनी आलोचना के लिए भारतीय भाषाओं की ऐसी रचनाओं का चुनाव करते हैं जो भारतीय सँस्कृति के 'सामासिक स्वरूप' को सामने लाती हैं । परम्परा का मूल्यांकन शमशेर की आलोचना-दृष्टि की आधारभूमि है, तो समकालीन रचनाशीलता का मूल्यांकन उनकी तटस्थता और सजगता का प्रमाण । अपने समय के प्रति जागरूक रचनाकार ही साहित्य, समाज और मनुष्य को अपनी 'मनुष्यता खोने के डर' से उबारकर इन सबको 'मनुष्यता की उच्च भूमि' पर खड़ा कर सकता है । शमशेर इस और कदम बढाते नजर आते हैं । शमशेर निर्मम आलोचक नहीं हैं । निराला, गालिब, सुभद्रा कुमारी चौहान, नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन आदि न जाने कितने रचनाकारों पर लिखी आलोचना उनके सन्तुलित और स्वस्थ दृष्टिकोण की परिचायक है । नागार्जुन को 'मुँहफट कवि', त्रिलोचन को 'साहित्य का हनुमान' आदि कह देना शमशेर की बेबाक आत्मीयता का ही प्रमाण है । शमशेर के खारे में अब तक 'अनकही' अनेक बातों को कहने की कोशिश के साथ यह पुस्तक 'पब्लिक स्फेयर' में प्रस्तुत है ।

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    Nirbhay Kumar

    निर्भय कुमार

    निर्भय कुमार का जन्य 15 जुलाई, 1988 को गाम-पतिलार, जिला-पश्चिमी चम्पारण, बिहार में हुआ । आपने यूजीसी जे. आर. एफ. की परीक्षा उतीर्ण करने के साथ 'शमशेर बहादुर सिह की आलोचना-दृष्टि' विषय पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से एम. फिल. की उपाधि प्राप्त की और वर्तमान में 'हिन्दी कथा साहित्य में सैक्युअलिटी की अवधारणा (1990 के बाद)'  विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएच. डी. कर रहे हैं । आपके विभिन्न विषयों पर लेख, कविताएँ आदि हिन्दी भाषा को शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं । साहित्य अकादेमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' में प्रकाशित आपका 'जब अपना ही घर पहचानना पड़े' शीर्षक रिपोर्ताज बेहद चर्चित है । वर्तमान में आप हिन्दी विभाग, रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं ।
    सम्पर्क: मकान सं. : बी. 8/1, ग्राउंड फ्लोर, गली सं. 14/1, वजीराबाद गाँव, दिल्ली- 110084

    ईमेल : kumar88nirbhay@gmail.com


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