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Sutradhar

Sutradhar

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  • Pages: 343p
  • Year: 2016, 6th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171198147
  • ISBN 13: 9788171198146
  •  
    सूत्रधार अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिंदी की यथार्थवादी कथा-परंपरा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है। ‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितांत चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ कहा था और उनके अभिनंदनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ यही थे ? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वंद्व से गुजरते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूप-छाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के आंतरबाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई जरूरत। जरूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से संबलित है; और उसमें न सिर्फ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडंबनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अंत तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है। - रामकुमार कृषक

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    Sanjeev

    जन्म: 6 जुलाई, 1947 को बांगर कलाँ गाँव, सुलतानपुर (उ.प्र.)।

    सनदों में नाम: राम सजीवन प्रसाद।

    शिक्षा: बी.एस-सी., ए.आई.सी. (भारत); शिक्षा-दीक्षा और नौकरी पश्चिम बंगाल में।

    प्रकाशित रचनाएँ: कहानी-संग्रह: तीस साल का सफरनामा, आप यहाँ हैं, भूमिका और अन्य कहानियाँ, प्रेतमुक्ति, दुनिया की सबसे हसीन औरत, ब्लैक होल, खोज, गति का पहला सिद्धान्त, गुफा का आदमी, दस कहानियाँ, गली के मोड़ पर सूना-सा कोई दरवाजा, संजीव की कथायात्रा: पड़ाव: 1,2,3; उपन्यास: किशनगढ़ के अहेरी, सर्कस, सावधान! नीचे आग है, धार, पाँव तले की दूब, जंगल जहाँ शुरू होता है, सूत्रधार, आकाश चम्पा, रह गईं दिशाएँ इसी पार; बाल उपन्यास: रानी की सराय, डायन।

    कृतियों पर फिल्में: सावधान! नीचे आग है उपन्यास पर काला हीरा नामक टेलीफिल्म, ‘प्रकाश झा प्रोडक्शन’ द्वारा हिमरेखा कहानी पर फिल्म निर्माणाधीन; श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म वेल डन अब्बा कहानी फुलवा का पुल पर आधारित।

    सम्मान: प्रथम पुरस्कार: सारिका: सर्वभाषा कथा प्रतियोगिता, 1980; प्रथम कथाक्रम सम्मान लखनऊ, 1997; इंदु शर्मा स्मृति अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, 2001; भिखारी ठाकुर लोक सम्मान, 2005; ‘पहल’ सम्मान, 2006; सुधा स्मृति सम्मान, 2008।

    सम्प्रति: राइटर इन रेजीडेंस, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)।

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